शहरी भारत 2014 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 18 जनवरी 2016 - 3:08pm
भारत में आंतरिक प्रवसनः संदर्भ तय करना

यह दस्तावेज पृष्ठभूमि प्रस्तुत करता है जहां प्रवसन को उत्तरजीविका रहने के लिए एक आवश्यक कार्ययोजना माना जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था के बेरोजगारों के विकास की अवस्था ने बहुत सारे लोगों को बाध्य किया कि वे अल्पकालिक और दीर्घकालिक आवागमन अपनाये जिसमें घर और कार्यस्थल का रूपांतरण सम्मिलित है। मौसमी प्रवासन सर्वाधिक सामान्य कार्ययोजनाओं में से एक है जो कि ग्रामीण जनता के द्वारा अपनाया जाता है खास तौर पर तब जब वे चुनौतियो का सामना करते हैं जो कृषि से संबंधित उनके कार्य को प्रभावित करता है जैसे कि जल सिंचाई का अभाव, विषम जलवायु परिस्थितियाँ। वस्त्र क्षेत्र और खानों में काम करने के अलावा अल्पकालिक प्रवासियों में से ज्यादतर संरचना और इंट सांचा सेक्टर में अंतिम रूप से जुड़ जाते हैं। यद्यपि यह सर्वविदित है कि मौसमी अल्पकालीन प्रवासन वृहद संख्या के लोगों की गति को अंतरनिहित करते है फिर भी उनकी संख्या का और प्रवासियों के घरों की खुशहाली के स्तर का अंदाज लगाना कठिन है। दस्जावेज तर्क देता है कि वहाँ दो विचार-विषय है जिसपर कि सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। पहला महत्वपूर्ण आंकड़ों के अंतरालों को भरना है। दूसरा अधिकारों की सार्वभौमिक सुवाह्यता। इसके अलावा बहुत से गैर-सरकारी संगठन हैं जो कि प्रवासी कार्यकर्ताओं की सहायता में विविध भूमिकाएं निभा रहे हैं, इस संदर्भ में बड़ी भूमिकायें निभा सकता हैं। यह ग्रामीण और शहरी दोनों सिरों में, प्रवासियों की परिगणना को समर्थ बनाएगा और सेवाओं की दोनों स्तरों पर उपलब्धता सुनिश्चित करेगा ताकि प्रवासी सेवाओं की उपलब्धता से वंचित न रह जाएं।

एस. चंद्रशेखर और पूर्णिमा डोर
अलग दुनिया को जोड़नाः भारत में ग्रामीण-शहरी मौसमी प्रवासन की प्रक्रिया को समझना

ग्रामीण गरीबों का शहरों में प्रवासन को तेजी से शहरी विकास के सबसे बड़े घटकों में से एक माना जाता है। परस्पर विरोधी प्रमाणों के बाद भी शहरी नीतियों और ग्रामीण विकास कार्यनीतियों दोनों का बल ग्रामीण से बाहर प्रवासन रोकना या घटाना है जबकि शहरी केंद्र बढ़ते हुए रूप से प्रवासनों की तरफ अपवर्जित रूप से है। ग्रामीण विकास नीतियाँ पूर्वधारणा से दिशा निर्देशित है कि प्रभावी और कुशल ग्रामीण विकास कार्यक्रम तकनीक के अनुप्रेरण वित्त और अच्छे बाजार की कड़ियों के साथ गांवों को आत्मनिर्भर बनाकर जनसंख्या गति को घटा सकती है। वास्तविकता में ग्रामीण नागरिक स्थानिक सामाजिक और पारिस्थितिकी चुनौतियाँ के कारण बाहय होते हैं कि वे गावों से बाहर जायें। किसी स्त्रोत या मंजिल पर क्षेत्र अध्ययन पर आधारित यह दस्तावेज मध्यप्रदेश राज्य में जनजाति प्रवासियों के अनुभवों पर प्रकाश डालता है और तर्क देता है कि यह दोषपूर्ण नीतियों का सप्तक मौसमी प्रवासन के सूक्ष्म-स्तरीय-बल समझने के अभाव का परिणाम है।

डॉ योगेश कुमार और सुश्री अनामिका अजय
ओडीशा के गैसीलाट ब्लाक, बारगढ़ जिला की प्रवासन अध्ययन रिपोर्ट

ओडिशा बहुत सारे घटक जिनमें सम्मिलित हैं व्यापक गरीबी बारम्बार प्राकृतिक आपदा और अकृषी नियुक्ति के अभाव के परिणाम स्वरूप ओडिशा के कई जिलों से बगल के उसी राज्य के जिलें यहाँ तक कि दूसरे राज्य में वृहत प्रवसन हुआ है। फिर भी प्रवसन की प्रकृति मौसमी है जिनमें 6-7 महीने लगते हैं कुछ मामलों में 9 महीने लगते हैं। कागजात बाड़गढ़ जिला ओडिशा से अल्पकालीन प्रवसन की प्रकृति के बारे में चर्चा करता है और यह इस जिले के गैसीलाट ब्लॉक के परिवारों के सर्वेक्षण पर आधारित है।

कान्हू चरण माझी, अभय चंद्र त्रिपाठी, जादुमणि प्रधान
नौकरी की खोज और गंतव्य स्थान पर प्रवासकों की श्रम बाजार संबंधी स्थितियां: लखनऊ का मामला

प्रवासन मनुष्य विकास का एक अभिन्न हिस्सा है और आंतरिक प्रवासन विकासशील देशों में बहुतायत है। यद्यपि प्रवासन सिद्धांतों में लोगों के संचलन के वृहत और वैयक्तिक परिप्रेक्ष्य से नौकरी की खोज की प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया तथा आवाजाही के कारण प्रवासन के सम्मुख आने वाली अड़चनों की विस्तार से व्याख्या की गई। यह दस्तावेज इन कुछ पत्रों को उजागर करता है और प्रवासन द्वारा उनके गंतव्य स्थान पर उनके समक्ष आने वाली समस्याओं, उनकी नौकरी की खोज की प्रक्रिया, नौकरी की गतिशीलता और दूसरे श्रम बाजार के मुद्दों पर प्रकाश डालता है। यह अध्ययन प्रवासियों के प्राथमिक सर्वेक्षण पर निर्भर करता है, जो चुने हुए श्रम संचयन केन्द्रों पर संचालित किए गए जहाँ प्रवासन राजधानी नगर लखनऊ उत्तर प्रदेश, भारत के अंतर्गत काम खोजते हैं।

प्रोबीर बोस और रामजी राय
प्रवासी कर्मियों की खुशहालीः नवी मुंबई में दैनिक श्रम बाजार से परिप्रेक्ष्य

दैनिक श्रम बाजार नवी मुंबई के परिप्रेक्ष्य से यह दस्तावेज नवी मुबंई में नाका नामक सात स्थानों में दैनिक श्रम बाजारों में प्रवासी श्रमिकों के सर्वेक्षण पर आधारित है। यह दस्तावेज प्रवासियों में नगरों में समाकलन के विभिन्न पहलुओं तक की पहुँच का प्रलेखन करता है जैसे कि आवास, बुनियादी सुविधाएं, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय समावेशन इत्यादि। यह दैनिक श्रम बाजार के विभिन्न पक्षों के बारे में विवरण उपलब्ध कराता है जैसे कि मजदूरी, रोजगार और पेशा संबंधी जोखिम। अध्ययन से पता चलता है कि आधारभूत सुविधाओं की उपलब्धता बेरोजगारी, स्वास्थ्य समस्याओं के अतिरिक्त श्रमिकों का एक वृहत भाग उनकी मजदूरी की गैर-अदायगी जैसे जोखिम का सामना भी करते हैं। मजदूरी भुगतान दबा लेने की विभिन्न बाजार स्तरीय सह-किस्मों जैसेकि अंतरराज्य प्रवासन का हिस्सा, भाषा और जाति विखंडन आदि का विश्लेषण करते हुए यह तर्क दिया जाता है कि एक विनियमित दैनिक श्रम बाजार मजदूरी भुगतान से संबंधित कुछ समस्याओं को हल कर सकते हैं। श्रमिकों में राजनीतिक आवाज की कमी बेहतर जीवन और कार्य स्थिति की मांग करने में उनकी अक्षमता का उल्लेख कर सकती है।

कार्तिकेय नरपराजु
महानगरों में प्रवासन और संघर्ष: हैदराबाद में प्रवासियों का अध्ययन

प्रवासन एक ऐतिहासिक परिदृश्य है और मानव अस्तित्व का एक अभिन्न अंग जबकि स्थानिक संचलन के परिणामस्वरूप विविधता और बहुसंस्कृतिवाद उत्पन्न हुआ है, प्रवासकों के अंतर्प्रवाह से नगरों की परिधि सीमाओं में अनौपचारिक बस्तियों का निर्माण हुआ है। इन क्षेत्रों मे, प्रवासक संघर्ष करते हैं कि वे नये सामाजिक स्थान में अपने पैर जमायें। ऐसे परिदृश्य में पहचान की समस्या प्रवासकों के लिए एक नया अर्थ हासिल करने लगा है और रिश्तेदारी और मित्रता के बंधन महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था के रूप में उनके लिए आगे आए हैं। वर्तमान अध्ययन श्रम बाजार की दशाओं और हैदराबाद के प्रवासकों के अनुभव की ओर ध्यान देता है।

त्रिवेणी गोस्वामी वर्नल, बागमी प्रियदर्शिनी, सैयद नईम, पी. राघवेंद्र (युगान्तर)
बैंगलूरू के प्रवासी निर्माण कर्मिकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और उनकी आजीविका में सुधार करने की मध्यस्था योजना

भारत में ग्रामीण से शहरी प्रवासी दोनों लघु और दीर्घकालीन गतिशीलता के लिए बढ़ रही है। करीब आधे प्रवासक अपनी मंजिल निर्माण क्षेत्र में पाते है। बैंगलूर दूसरे कर्नाटक शहरी क्षेत्रो के साथ-साथ निर्माण उद्योग के रूप में प्रमुख केन्द्र के रूप उभरा हैं और अपनी तरफ राज्य या राज्य के बाहर से भी प्रवासकों को आकर्षित करता है। जबकि यह प्रतीत हो सकता है कि प्रवासन निर्माण उद्योग में श्रमिकों को उच्च आमदनी प्राप्त होती है, दयनीय आवासीय पीड़ाएं और रहने की अस्वस्थ्यकर स्थिति ऐसी कुछ अतिसूक्ष्म कीमते हैं जो प्रवासी कर्मिको को उपगत करना पड़ता है। ये असंगठित कर्मिक आदर्श मजदूरी तथा अच्छा जीवन और कार्य करने की अवस्थाओं के बारे में मोलभाव करने में असमर्थ हैं और यह स्थिति बहुत अस्थिर है खासतौर पर अंतर राज्यीय प्रवासकों के लिए। यह अध्ययन प्रवास के लिए कार्यक्रमों एवं नीतियां का अभिकल्पन करने में सहायता देने की दृष्टि से बेंगलुरू के प्रवासी निर्माण कर्मिकों की हालत पर आधारित है

स्मिता प्रेमचंद्र, वी. प्रमीला, शम्मीम बानु, के.जी. मीनाक्षी, होसल्ली मंजुनाथ, टी. प्रेमा, संपर्क (बैंगलोर)
कोलकाता की झोपड़ पट्टियों में प्रवास: एक लैंगिक-परिप्रेक्ष्य

प्रवासन की संकल्पना सामाजिक विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए नई नहीं है। परम्परागत प्रतिमान-प्रवासियों को 'पुश-पुल' परिप्रेक्ष्य से वर्णित करते है। तथापि, वे प्रवास को प्रभावित करने वाली सामाजिक प्रक्रियाओं के प्रभाव विशेषतौर पर उन महिलाओं से संबंधित मुद्दों को ध्यान में रखने में विफल रहते हैं जिनका प्रवासन अथवा श्रम बाजार से संबंधित अध्ययनों में व्यापक तौर पर अल्प प्रतिनिधित्व होता है। इस तथ्य के बावजूद कि महिलाओं का नगर में विवाह/परिवार के आवागमन प्रवासन के लिए मुख्य कारण है, यह जानना महत्वपूर्ण है कि वे स्त्रोत क्षेत्र में कर्मकार थे और गंतव्य स्थान पर भी क्षमतावान कर्मकार हैं। कोलकाता की झोपड़पटटी से एक प्रतिदर्श लेते हुए इस दस्तावेज में महिलाओं की सहबद्ध निवास-प्रवर्तकों के रूप में समग्र भूमिका को अमान्य करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा इस दस्तावेज में प्रवासियों की पृष्ठभूमि की रूपरेखा पर चर्चा की गई है तथा प्रवासकों की श्रम बाजार में सहभागिता, कार्य के प्रकारों तथा संबंधित मुद्दों के लैंगिक विभाजन का ब्यौरा दिया गया है।

अर्पिता बेनर्जी
कपास के बीज के उत्पादन में बाल श्रमः उत्तरी गुजरात में कपास के बीज का मामला

गुजरात का स्थान कपास तथा कपास के बीज के उत्पादन में महत्वपूर्ण है। विगत कुछ वर्षों के दौरान कपास के उत्पादन के अंतर्गत क्षेत्र में निरंतर वृद्धि होती रही है। कपास के बीज की कीमत में समानुपाती वृद्धि के बगैर श्रम की कीमतों में वृद्धि तथा हस्तचालित परपरागण की सतत पद्धति के कारण, बीटी कपास के किसान सामान्यतौर वयस्क पुरूषों की अपेक्षा निम्न मजदूरी में बाल श्रम को किराये पर लेते हैं। अधिकांश किसान श्रम के मुख्य स्त्रोत के रूप में बालकों को नियोजित करते हैं जहां करीब तीन-चौथाई ई-श्रमिकों की आयु 6-18 वर्ष होती है। बालक बुरी स्थितियों में 9-11 घंटे प्रतिदिन कार्य करते हैं और प्राप्त मजदूरी, विधिक पारिश्रमिक से काफी कम होता है। यह दस्तावेज कपास के बीज के उत्पादन में बालश्रम के प्रयोग का प्रलेखन है जिसमें भर्ती प्रक्रियाओं और कार्य तथा रहने की दशाओं पर बल दिया गया है। इस दस्तावेज में उत्तरी गुजरात में क्षेत्र सर्वेक्षण से प्राप्त आकड़ों को प्रस्तुत किया गया है जहां किसानों, संविदाकारों तथा कर्मकारों के साथ क्रमबद्ध साक्षात्कार किए गए।

अशोक खंडेलवाल, सुधीर कटियार, मदन वैष्णव दक्षिणी राजस्थान मजदूर यूनियन (डूंगरपुर)
प्रवासियों के अधिकार की रक्षा करने के लिए नीतियां: एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण

प्रवासक तथा प्रवासा कर्मकारों की दशा एवं हकदारियों पर चर्चा गंतव्य स्थान पर उनके अधिकारों के रक्षोपाय के लिए उपलब्ध नीतिगत ढ़ांचे के संदर्भ के बगैर अपूर्ण रहती है। यहां यह उल्लेखनीय है कि अन्तर राज्य प्रवासन कर्मकार (नियोजन एवं सेवा शर्तों का विनिमयन) अधिनियम 1979 को छोड़कर भारत में प्रवासियों पर अनन्य रूप से आधारित कोई अन्य कानून नहीं है। प्रायः उन्हें उनके अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए अभिप्रेत श्रम कानूनों की जानकारी नहीं है। इस दस्तावेज में न्यायालयी मामलों जिनका प्रवासी कामगारों के जीवन एवं कार्य दशाओं पर प्रभाव होता है, के अतिरिक्त विभिन्न श्रम विधानों के सिद्धांतों तथा उनकी विवक्षाओं पर चर्चा की गई है। ध्यातव्य है कि कामगारों की सुरक्षा के रक्षोपायों के लिए कुछ मौजूदा विधान प्रवासी कामगारों पर भी समान रूप से लागू है।

देबोलिना कुंडू
Year: 
2014