शहरी भारत 2013 | जुलाई-दिसम्बर

Submitted by niuaadmin on 15 जनवरी 2016 - 12:58pm
भारत के शहरी ढांचा को वित्तपोषित करने में सुधार पहलः जेएनएनयूआरएम का मामला

जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के आरम्भ से शहरों को ढांचागत विकास और गरीबों के आवास के लिए वास्तविक केन्द्रीय सहायता नगरों को उपलब्ध कराई गई। फिर भी एक गहन परीक्षण इस मिशन के तहत निधि की व्यवस्था में बढती हुई क्षेत्रीय और स्थानिक विषमता को प्रकट करता है। जेएनएनयूआरएम निधि का वितरण तुलनात्मक रूप से आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों में और उनके बड़े नगरों में केन्द्रित पाया गया। नगर स्तर पर वाणिज्यिक रूप से स्पर्धात्मक योजनाओं को सभी के लिए बुनियादी सेवाओं से ज्यादा प्राथमिकता दी गई। यूएलबी सीमित तकनीकी क्षमता के मद्देनजर, नगर विकास योजनाएं जो नगर की भविष्य की जरूरतों के लिए योजनाएं बनाने हेतु अभिप्रेत थी, निजी परामर्शदाता द्वारा तैयार की गई और ज्यादातर मामलों में प्राथमिकता वाली ढांचागत परियोजनाओं की पहचान बिना किसी नागरिक की हिस्सेदारी के करने का कार्य किया। सीमित आंतरिक संसाधन संघटन क्षमताओं को देखते हुए ज्यादातर यूएलबी केन्द्रीय सरकार के अनुदान के सामानांतर पर्याप्त आर्थिक योगदान देने में असफल रहे। परिणामस्वरूप उनके लिए केन्द्रीय निधि के प्रवाह में अनियमितता आयी। यह दस्तावेज मौजूदा शहरी शासन ढांचा पर जेएनएनयूआरएम के प्रभावों का मूल्यांकन करने और सुधारों की प्रगति का और विभिन्न तरह की परियोजनाओं के लिए दिए गए स्तर का सिंहावलोकन है।

सौम्यादीप चट्टोपाध्याय और दुर्गेश एम. तिवारी
जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी सुधार- एक मूल्यांकन

जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) सुधार संबद्ध निवेश आर्थिक रूप से संधारणीय नगरों का विकास सक्षम शासन बेहतर अवसंरचना एवं उन्नत सेवा प्रदानगी के जरिए सुनिश्चित करने हेतु तैयार किया गया है। जेएनएनयूआरएम ने महत्वपूर्ण निवेश और नगरों के मूलभूत ढांचे में सुधार में योगदान दिया हैं। इस सुधार से जुड़ी निवेश कार्यनीति में राज्य और शहरी स्थानीय निकायों को इस उद्देश्य से प्रोत्साहित किया है कि वे सेवा वितरण प्रणाली में परिवर्तन लायें और संसाधनों में बढोत्तरी करें जो स्वयं संपोषणीय बन सके। जहां तक सुधार के लागू होने के स्तर का संबंध है, राज्य जो अपेक्षित रूप से विकसित और आर्थिक रूप से मजबूत है, ने सुधार पहल दूसरों से पहले की हैं जबकि शेष लागू होने के भिन्न चरणों में हैं। यह दस्तावेज मिशन नगरों में सुधार के लागू होने के स्तर को प्रस्तुत करता है। यह कारणों और सुधारों के लागू होने में नगरों द्वारा सामना की जा रही और समस्याओं का विश्लेषण करता है और दूसरी पीढी के जेएनएनयूआरएम के लिए उपायों का सुझाव देता है।

प्रज्ञा शर्मा
केरल में जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी बुनियादी ढांचा निवेश का स्तरः केरल के संधारणीय शहरी विकास योजना के विशेष परिप्रेक्ष्य में अध्ययन

संधारणीय समाज के प्रति बढी हुई जागरूकता, साथ में हमारे नगरों को रहने लायक बनाने की जरूरत शहरी ढांचा की व्यवस्था और प्रबंधन में मांग पक्ष हस्तक्षेप को मजबूत करता है। वर्तमान दस्तावेज में शहरी अवसंरचना प्रणाली तथा बहुविध पहलुओं जो केरल के संधारणीय शहरी अवसंरचना कार्यक्रम के विशेष संदर्भ में है, राज्य में शहरी अवसंरचना परियोजनाओं को प्रभावित करते है, के प्रति मौजूदा आयोजना अभिगम के समालोचनात्मक विश्लेषण को व्यक्त किया गया है।

सुरेश। वी.एन. और अर्चना अरविंदन
सामाजिक रूप से जिम्मेदार शहरी स्थानीय अभिशासन की ओर: पश्चिम बंगाल में नागरिक घोषणापत्र सुधार

तेजी से प्रगतिशील शहरी वातावरण में भारत में चार्टर सुधारों की पहल एक जबर्दस्त शुरूआती सुधार रहा है। एक शक्तिशाली सामाजिक जिम्मेदारी पद्धति के रूप में सिटीजन चार्टर जन सेवा वितरण का उच्चस्तरीय प्रबंधन निश्चित करने के लिए जो शहरी सुशासन को और जिम्मेवार अभिशासन प्रोत्साहित करती है को लंबी दूरी तय कर सकती है। इस निर्देश पर आधारित दस्तावेज पश्चिम बंगाल जो चुनिंदा भारतीय राज्य है जहां नगरपालिका सुधार के प्रयोग में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। में चुने हुए शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) में घोषणापत्र अनुभव को वश में करना चाहता है अनुमेतिमूलक निष्कर्षों के प्रकाश में नागरिक सुधारों और नगरीय अभिशासन अत्यधिक वांछनीय प्राधिकरणों के बीच अत्यधिक वांछित कड़ी स्थापित करने में घोषणा पत्र की सफलता की जांच करने के लिए प्रयास किया गया है।

पायल सेन
कर्नाटक में शहरी संपत्ति स्वामित्व रिकार्ड (यूपीओआर): शहरी संपत्तियो के लिए कंप्यूटरीकृत भूमि पंजीकरण पद्धति

प्रभावपूर्ण भूमि अभिशासन पर भारत मे पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। हाल के विश्व विकास की चुनौतियाँ, विशेष रूप से शहरीकरण, शहरी केंद्रों में प्रव्रजन, अप्रभावी भूमि प्रबंधन पद्धतियां, संस्थागत विखंडन, विकेंद्रीकृत सुधार और भूमि गारंटी मंजूर करने में कानून पद्धति में कमी से भूमि प्रशासन की जटिलता बढ़ गई है। इन समस्याओं पर काबू पाने के इरादे के साथ कर्नाटक में यूपीओआर की पहल की गयी है। यह आशा की जाती है कि सेवा प्रदानगी में कुशलता बढ़े और नागरिक को राज्य भर में भूमि रिकार्ड के डिजीटल प्रबंधन में से परिचित कराने में समर्थ बनाए। अगर सफलतापूर्वक लागू की गई तो यह एक अच्छी पद्धति के रूप में काम कर सकती है जिसका दूसरे राज्यों मे अनुकरण किया जा सकता है।

एस. मानसी और के.सी. स्मिता
जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी अपशिष्ट जल प्रबंधनः चंडीगढ़ संघ राज्य क्षेत्र का एक अध्ययन

अपशिष्ट जल प्रबंधन या इसकी कमी हमारी जैव-विविधता पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालता हमारे जीवन सहायक पद्धति की आधारभूत एकीकरण का विघटन करता है जिसपर शहरी विकास से लेकर भोजन निर्माण और उद्योग एक व्यापक तरह के क्षेत्र निर्भर करते हैं। इस तरह यह आवश्यक है कि अपशिष्ट जल प्रबंधन एकीकृत, पारिस्थितिकी आधारित प्रबंधन जो खंड सीमाओ में काम करता है, का भाग माना जाता है। वर्तमान अध्ययन अपशिष्ट जल प्रबंधन की आवश्यकता और महत्व को सिद्ध करने का प्रयास करता है। इस दस्तावेज का पहला खंड महत्वपूर्ण चुनौतियाँ के बारे में चर्चा करता है जो हम लोग अपशिष्ट जल प्रबंधन में सामना करते हैं और लोगों और वातावरण के लिए, इसकी विविक्षा पर विचार करता है। दूसरा खंड उन उपायों को भी प्रस्तुत करता है जो इन समस्याओं से निपटने के लिए राष्ट्र स्तर पर शुरू किए गए थे। तीसरा खंड अपशिष्ट जल प्रबंधन कार्यनीति का अध्ययन करता है जो कि चंडीगढ़ शासन द्वारा अपनाया गयी थी, तथा कार्यान्वयन में आने वाली समस्याओं एवं कमियों का भी अध्ययन करता है। अंतिम खंड हल खोजने की और सलाह देने की कोशिश करता है कि कैसे ये चुनौतियाँ हल की जा सकती हैं।

डॉ नमिता गुप्ता और राजीव गुप्ता
शहरी भारत मे बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच - शहरों/नगरों के आकार वर्ग का एक विश्लेषण

यह दस्तावेज शहरों और नगरों मे बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में विषमता जैसे कि पेयजल, स्वच्छता, बिजली, आवासीय स्तर और अपवहन प्रंबध में शहरी भारत का परीक्षण करता है जिसमें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की गृह स्थितियों की यूनिट रिकार्ड आकंडा का जातिगत, वर्ण, धार्मिक और आर्थिक समूह (जीविका वर्ग और गरीबी) के संदर्भ में प्रयोग किया गया। सारे संकेतकों के लिहाज से 1993 से 2008-09 तक सुधार देखे गये थे। फिर भी यह सुधार समाजिक और आर्थिक समूहों के बीच अतंराल घटाने मे पर्याप्त नहीं था। 2008-09 में सबसे ज्यादा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, सीएल और गरीब परिवार पाये गयें। बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता बेहतर पायी गयी जब हमलोग छोटे से बड़े शहरों और नगरों की ओर बढ़ते हों। समाजिक-धार्मिक और आर्थिक समूहों का प्रतिमान प्रत्येक वर्ग आकारों में एक ही तरह रहा, शहरों और नगरों में जहां विश्लेषण के लिए ली गई प्रत्येक बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता में सुधार हुआ। जब हमलोग छोटे से बडे़ शहरों की तरफ बढ़ें। यह संकेत करता है कि प्रत्येक वर्ग आकारों में शहरों और नगरों में विभिन्न समाजिक-धार्मिक और आर्थिक समूहों की उपलब्धि में उतार-चढ़ाव है। बुनियादी सुविधाएं जैसे कि पेय जल सुविधा, स्वच्छता सुविधाएं और निकास प्रंबधन को विशेष ध्यान की जरूरत है। परिणामों से इंगित होता है कि नियंत्रणों के रूप मे कार्यरत ऐसे कारक हैं जो कि सामाजिक पृष्ठभूमियों पर आधारित है और बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता से वंचित करने का कारण बन रहा है। इस अध्ययन के निष्कषों से इंगित होता है कि बुनियादी सुविधाओ पर शहरी भारत में विभिन्न वर्ग आकारों के शहरों और नगरों मे विभिन्न नीतियाँ पूरी किए जाने की जरूरत है, गरीबों के हितार्थ और समूह विशिष्ट नीतियाँ (सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक समूह) के साथ जिसमें छोटे शहरों और नगरों की ओर जीवन स्तर और सुकल्याण के उत्थान हेतु विशेष बल दिया जाना चाहिए।

अर्जुन कुमार
भारतीय महानगर में आर्थिक कार्यनिष्पादन, रोजगार की स्थिति, गरीबी और असमानता

महानगर एक नीति परिप्रेक्ष्य से भारत में महत्वपूर्ण हैं और केवल इसलिए नहीं कि आने वाले दशकों मे ज्यादा लोग वहाँ रहेंगे, बल्कि इसलिए कि वे राष्ट्रीय अर्थतंत्र के इंजिन हैं। छोटे और उभरते हुए मेट्रो आर्थिक रूप से बड़े मेट्रो की अपेक्षा, यद्यपि बड़े मेट्रो की आर्थिक महत्ता बेरोकटोक रहती है, आर्थिक रूप से बेहतर कार्यनिष्पादन कर रहे है। मेट्रो में शीघ्र कार्यकलाप के क्षेत्र सम्मिलित हैं-आर्थिक परिणाम; तथा विनिर्माण क्षेत्र के नवीकरण तथा मेट्रो के उपनगरों को अधिक मिश्रित भूमि-प्रयोग पद्धति के लिए खोलते हुए शहरीकरण तथा महानगरीयकरण प्रक्रियाओं के साथ पंक्तिबंद्ध के संदर्भ में सिकड़ते हुए मूलभागों एवं प्रसारवान उपनगरों के परिदृश्य के मुकाबले महानगरीय और क्षेत्रों के अधीन एकीकरण और समन्वय के मुद्दे। इसके साथ ही कमियां हैं जिन्हें कौशल विकास और प्रशिक्षण के क्षेत्र में दूर किया जाना है ताकि लोगों को महानगरों मे विशिष्ट कौशलों से सुसज्जित किया जा सके ताकि वे सेवा क्षेत्र में नियुक्तियाँ पायें। यह महानगरों के लिए महत्वपूर्ण जरूरत होगी जिसका सबसे कम आर्थिक कार्य-निष्पादन सूचकांक मूल्य है।

दिब्येन्दु सामंत
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Year: 
2013