शहरी भारत 2012 | जुलाई-दिसम्बर

Submitted by niuaadmin on 18 जनवरी 2016 - 4:11pm
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमः नीतिगत परिदृश्य एवं व्यावसायिक प्रत्याशाएं

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) विकासशील तथा परिवर्तनशील अर्थव्यवस्थाओं में विकास का साधन रहा है। उन्हें एशियाई, अफ्रीकी तथा लैटिन अमेरिकी देशों में लाखों लोगों के लिए जीविका के उच्च संभावित क्षेत्र के रूप में अभिज्ञात किया गया है। वे अधिकांश विकासशील देशों में 80 प्रतिशत से अधिक औद्योगिक उद्यमों को निरूपित करते हैं। विकसित देश से एमएसएमई के प्रति अपने औद्योगिकीकरण के लिए त्रृणी हैं। जापान तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में एमएसएमई आर्थिक इकाइयों के करीब 90 प्रतिशत भाग में निहित होता है। भारत में, एमएसएमई कुल औद्योगिक उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत है, औद्योगिक इकाईयों का 95 प्रतिशत तथा कुल निर्यातों का 34 प्रतिशत है। वे वृहत उद्योगों के लिए हथकरघा के सामान से लेकर मशीन के कलपुरजे के 6000 से अधिक उत्पादों का विनिर्माण करते हैं और 60 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। एमएसएमई समावेशी विकास के साधन हैं जो सर्वाधिक असुरक्षित और सर्वाधिक उपेक्षित वर्गों जैसे कि महिलाओं, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के जीवन को प्रभावित करते हैं। वे कृषि के बाद रोजगार का सर्वाधिक बड़ा साधन है। एमएसएमई क्षेत्र को केन्द्र तथा राज्य सरकारों, दोनों द्वारा एक प्राथमिकता वाले क्षेत्र का दर्जा किया गया है। इस क्षेत्र को हमारे देश में आर्थिक विकास की समावेशी प्रक्रियाओं को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।

शिप्रा मैत्रा
संपत्ति कर संबंधी वाद कानून तथा संपत्ति कर के आधार का सुधार करने के लिए विवक्षाएं

संपत्ति कर के तीन प्रकारों जो भारत में प्रचलित हैं- किरायेदारी मूल्य प्रणाली (आरवीएस) यूनिट मूल्य प्रणाली (यूवीएम) तथा पूंजीगत मूल्य प्रणाली (सीवीएस), में से आरवीएस अनेक प्रशासनिक, विधिक एवं व्यवहार संबंधी कमियों से जूझ रहा है जिनके कारण इस स्थानीय साधन की उपलब्धता एवं प्रत्यास्थता में कमी आई है। मुख्यतया आरवीएस के आधार की अत्यंत आत्मनिष्ठ एवं विवेकपूर्ण प्रकृति के ही कारण से उच्च न्यायालय तथा भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस कर के विधिक संधारणीय आधार का निर्वचन करने में मानक अथवा उचित किराये की संकल्पना प्रतिपादित की है। इसके परिणामस्वरूप पीटी के वैकल्पिक आधार की तलाश की गई जो किराया नियंत्रण अधिनियमों के निराशाजनक प्रभावों से मुक्त हो सकता हो। इसलिए इस पत्र में आधार में अक्षमताओं को समझने के लिए पीटी की एआरवी प्रणाली के आधार की प्रकृति का विश्लेषण किया गया है तथा हाल ही में नए शुरू किए गए वैकल्पिक आधारों जो कार्यसाधक हो सकते हैं, की प्रभावकारिता में परिज्ञान प्राप्त करने के लिए न्यायालयों द्वारा आधार के विधिक निर्वचन में क्रमिक विकासों का पता लगाया गया है। इसमें संपत्ति कर आधार जो शहरी स्थानीय निकायों के लिए राजस्व का प्रधान स्रोत है तथा देश के अनेक राज्यों में अभी भी विद्यमान है; की एआरवी प्रणाली का कायाकल्प करने के लिए वाद कानूनों की विवक्षाओं का भी विश्लेषण किया गया है।

गंगाधर झा
शहरी सार्वजनिक स्थानः अर्थतंत्र का अन्वेषण करना- प्रतिमानों, सिद्धान्तों, निर्वाचनों तथा प्रयोगिक प्रतिपादक

स्थान (स्पेस) एक प्रमुख तत्व है जिससे हमारा सामना किसी संदर्भ पर चर्चा करने के समय अथवा वस्तुतः मानव संबंधी स्थानिक अनुभूति के समय होता हैं। स्थान तथा इसके सार को समझना हमारे सार्वजनिक स्थानों को डिजाइन करने हेतु महत्वपूर्ण है। इस साहित्य की समीक्षा करना जिससे शहरी स्थान का पता लगाना तथा परिणामस्वरूप उठने वाले कतिपय प्रश्नों का उत्तर मांगना अनिवार्य हो जाता है। क्या स्थान को परिभाषित करने का कोई निश्चित तरीका है? शहरी होने के लिए क्या गुणवत्ता होनी चाहिए? किसी स्थान की मूलरूप से रूपरेखा तैयार करने वाले क्या-क्या मापदंड हैं जिनमें किसी शहरी परिप्रेक्ष्य में सार्वजनिक समारोह को पसंद किया जाता है। स्थान को विभिन्न परिप्रेक्ष्यों, दृष्टिकोणों अथवा अनुभवों के साथ किसी शहरी परिदृश्य में प्रायः ही परिभाषित किया गया है; यदि इन सभी टुकड़ों को पराकाष्ठा पर लाया जाए और इनकी समीक्षा की जाए तो शहरी स्थान तथा इसके अर्थ की पर्याप्त समझ हो सकती है। यह दस्तावेज विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने एवं शहरी स्थान के अभिप्रायों के सिंहावलोकन को इसके प्रस्तावकों तथा इन सिद्धान्तों एवं प्रतिमानों से प्राप्त निर्णायक निष्कर्षों द्वारा यथा प्रस्तावित विशिष्ट मापदंडों के अधीन संकलित करने के उद्देश्य से शहरी स्थान की कुछ परिभाषाओं को समझने का प्रयास करता है।

दक्षायिनी आर पाटिल तथा ममता पी राज
भारत में शहरी स्थानीय निकायों में उर्जा सक्षमता

ऊर्जा सक्षमता को बढ़ाना ऊर्जा की लागतों को बचाने तथा जलवायु परिवर्तन को अनुकूल बनाने तथा प्रशमित करने के लिए मुख्य अपेक्षा है। भारत में शहरी स्थानीय निकाय अत्यधिक उर्जा की खपत करता है और इन यूएलबी के लिए अत्यावश्यकता है कि ये उर्जा सक्षमता का उन्नयन करने के लिए कार्यनीतियां बनाएं और लागू करें। भारत सरकार तथा ऊर्जा सक्षमता ब्यूरो ने यूएलबी द्वारा इन कार्यनीतियों को अपनाए जाने हेतु समर्थकारी माहौल सृजित करने हेतु ढांचा तैयार किया है। तथापि, यूएलबी के बीच इस ढांचे तथा प्रक्रिया के संबंध में अधिक जागरूकता नहीं है। इस दस्तावेज में यूएलबी में ऊर्जा सक्षमता के लिए समर्थकारी ढांचा का व्यापक सिंहावलोकन प्रदान किया गया है तथा मुख्य मुद्दों की पहचान की गई है और आगे की राह सुझाई गई है।

ए. नरेंद्र
भारत में शहरी अवसंरचना का वित्तपोषणः एक समीक्षा

अधिकांश भारतीय नगरों में शहरी अवसंरचना के वित्तपोषण की समस्या गंभीर है और वित्तपोषण की अधिकांश चुनौतियां अभी भी अनुत्तरित हैं। यह दशा शहरी अभिशासन के लिए बदतर है जहां अनेक शहरी स्थानीय निकाय अनुदानों के रूप में सरकार के उच्चतर स्तरों पर अत्यधिक निर्भर हैं। निरंतर भारी राजस्व घाटे के कारण चिरकारी राजकोषीय दुर्बलता से स्थानीय शासन के कार्यकरण को बाधा पहुँची है जिसके परिणामस्वरूप नागरिक सेवाओं एवं अवसंरचना का अपर्याप्त कार्य-निष्पादन हुआ है। शहरीकरण एवं आर्थिक विकास के साथ संयोजित शहरीकरण की उच्च दर भारत में नागरिक सेवाओं एवं अवसंरचना पर अत्यधिक अतिरिक्त दबाव डाल रही है। इन बढ़ती हुई चुनौतियों से निपटने के लिए वित्तपोषण की शहरी अवसंरचना के वर्तमान परिदृश्य में समग्र सुधारों की आवश्यकता है। हाल के समय में केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा अपनी योजना नीतियां एवं कार्यक्रम इत्यादि में पर्याप्त निधियों एवं वित्तीय सहायता की व्यवस्था करके नागरिक सेवाओं एवं अवसंरचना के प्रदानगी स्तर में सुधार लाने के लिए दिया जा रहा अधिक ध्यान देखने में आया है। इस शोध लेख का मुख्य प्रयोजन भारत में अवसंरचना वित-तंत्र की समीक्षा करना तथा शहरी स्थानीय निकायों को सक्षम एवं उन्नत सेवाओं और अवसंरचना से लैस करने के लिए संभावित तरीके सुझाने हैं। 12वें एवं 13वें केन्द्रीय वित्त आयोग, जेएनएनयूआरएम, 74वें संवैधानिक संशोधन, एचपीईसी इत्यादि द्वारा सुझाए गए सुधारों पर भी शोध-पत्र में विचार किया गया है। ये सभी सामूहिक रूप में त्वरित शहरीकरण तथा शहरी विकास के मुकाबले जोखिम को दूर करने के लिए शहरी स्थानीय निकायों को बेहतर ढंग से सुसज्जित कर सकते हैं।

सतपाल सिंह
सेवा प्रदानगी द्वारा शहरी निर्धनता उपशमनः भारत में गरीबों के लिए शहरी सेवाओं को वित्तपोषित करने का निधि-आधारित प्रस्ताव

शहरों में बढ़ते हुए स्तरों के साथ शहरी निर्धनता तेजी से भारतीय नगरों के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती बन रही है। निर्धनता उपशमन कार्यक्रम पारंपरिक रूप से राज्य सरकारों द्वारा बाह्य/दाता सहायता के साथ अथवा के बगैर कार्यान्वित किए जाते है और ये गरीबों को आय अथवा रोजगार अथवा दोनों प्रदान करने पर लक्षित हैं। 74वें संवैधानिक संशोधन ने शहरी निर्धनता उपशमन को शहरी स्थानीय शासन (यूएलजी) सूची की एक मद बना दी है जिससे वे इसके लिए कुछ कदम उठाने के लिए जिम्मेवार बन गए हैं (किन्तु तत्संबंधी निधिकरण अधिदेश न प्रदान करके बोझ को और भी बढा दिया है)। नगर निर्धनता उपशमन को विभिन्न तरीकों से अपनाते रहे हैं। शहरी निर्धनता को दूर करने के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण एप्रोच विशेष निधि की स्थापना करके वित्तीय मध्यस्थता अभिगमों की स्थापना करना है ताकि इस समस्या से प्रभावी ढंग से तथा लक्षित ढंग से निपटा जा सके। कुछ मौजूदा प्रतिमानों के अनुभवों से पता चलता है कि इस प्रयोजनार्थ विशेषीकृत निधियों के गठन के जरिए वित प्रवाह का विवेकपूर्वक इस्तेमाल करना संभव है। यह पत्र कुछ मौजूदा निधि आधारित मॉडल पर चर्चा करने के पश्चात् इस प्रस्ताव को अपनाने की आवश्यकता पर भी तर्क देता है। इन प्रस्तावों की प्रासंगिकता कि हम बुनियादी सेवाओं को भारत में शहरी गरीबों को उपलब्ध करें पर भी विचार-विमर्श किया जाता है। यह दस्तावेज शहरी गरीबों को विभिन्न स्रोतों से बुनियादी सेवाओं की व्यवस्था को वित्तपोषित करने हेतु एक अनन्य बीएसयूपी कोष की स्थापना करने के लिए व्यापक ढांचा भी उपलब्ध कराती है।

रामाकृष्ण नल्लाथीगा
मामले का अध्ययनः दिल्ली बस रैपिड ट्रांजिट - व्यापक मास रैपिड ट्रांजिट परियोजना की महत्वपूर्ण समीक्षा

बढ़ती अर्थव्यवस्था, बढ़ा हुआ शहरीकरण और अंर्तनागरीय आमोद-यात्रा ने व्यापक शीघ्रगामी परियोजनाओं को विकासशील दुनिया में आवश्यक कर दिया है। भारतीय राजधानी ने हाल ही में परिवहन योजनाएं तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की है जैसे कि दिल्ली मेट्रो, दिल्ली बस शीघ्रगामी परिवहन आदि। परवर्ती ने अत्यधिक ध्यान, वाद विवाद और मुकदमा आकर्षित किया है। जबकि विचार-वस्तु काफी हद तक 'बस बनाम कार' तक सीमित कर दी गयी है, सार्वजनिक परिवहन साधन के चयन पर सीमित चर्चा हुई है। यह दस्तावेज इस स्थिति पर प्रयोगों और व्यवहारों पर आधारित दृष्टिकोण रखता है और यह स्थापित करता है कि कैसे दिल्ली बस शीघ्रगामी परिवहन विभिन्न तकनीकी-आर्थिक मानकों पर कम पड़ता है।

शिल्पी मित्तल
जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी सुधारः शिलांग में सीमित भूमि बाजार में विरोधाभास एवं प्रतिवाद

यह दस्तावेज शिलांग में पारंपरिक भूमि धारण अधिकार प्रणाली में सन्निहित विरोधाभासों और कैसे वे शहरी सुधार के नवीन विकास तर्क के तहत काम करते हैं जो शहरी सुधार को जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत विचार किए गए थे, का पता लगाने का प्रयास करता है। पहला खंड छठी अनुसूची के क्षेत्र के औचित्य के संबंध में जहां 74वां संवैधानिक सुधार अधिनियम लागू नहीं होता है और जहां भूमि धारण अधिकार पद्धति और स्थानीय अभिशासन पारंपरिक काननों के द्वारा परिभाषित हैं, सुधारों की एक समीक्षा प्रदान करने का प्रयास करता है। इस तरह जबकि सुधार उन क्षेत्रों में अधिकतम हो जाते हैं, जहाँ ज्यादा लाभप्रद वित्तीय पैकेज के विरूद्ध कांतिवर्द्धक उत्सर्जनीय व्यापक तौर पर यह भूमि संपन्न उच्चवर्ग को समर्थन देता है, नगर की शहरी भूमि राजनीति में प्रान्तीयता, बारीक तौर पर परवर्ती उदार शहरी विकास योजनाओं के सजातीय प्रयासों को चुनौती देते हैं। इस पृष्ठ भूमि के साथ, दूसरा खंड शहरी स्थानीय निकाय से उचित देशांतरीय आंकड़ों का प्रयोग करता है ताकि खास तौर पर निर्माण कार्यकलाप में कमियों को सबके सामने लाया जा सके। यह असंहिताबद्ध पद्धति के सहचारी निक्षेप भूमि संव्यवहार के रूप में स्पष्ट किया गया है जो कि सामान्यतौर पर एक नियंत्रित भूमि बाजार पर टूट पड़ता है जो हमेशा खामोशी से आँख के आगे से निकल जाता है या परवर्ती उदारीकृत विकासात्मक कल्पना के इस तरह के क्षेत्र में प्रक्षिप्त नहीं है। तीसरा खंड आवास और समग्र निर्मित पर्यावरण के कुछ निश्चित पहलुओं पर संकेन्द्रित है जो यह दर्शाने का प्रयास करता है कि यह कैसे उच्च आय वर्ग के समर्थन में अभिमुख हो गया है।

नबानिता कानूंगो
Year: 
2012