शहरी भारत 2012 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 18 जनवरी 2016 - 5:09pm
मुंबई की मलिन बस्तियों में नागरिक सुविधाएं

सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य का उद्देश्य 2015 तक स्वच्छ पेयजल और बुनियादी स्वच्छता की संधारणीय उपलब्धता से वंचित जनसंख्या के अनुपात को आधा करना है तथा इसका लक्ष्य न्यूनतम 100 मिलियन मलिन बस्ती निवासियों के जीवन में महत्वपूर्ण सुधार हासिल करना है। मलिन बस्ती की वृहत्त जनसंख्या से विकासशील देशों में नीति निर्माताओं तथा कार्यक्रम योजनाओं के समक्ष अनेक चुनौतियाँ उपस्थित हुई हैं। इस शोध पत्र में मुम्बई में मलिनबस्तियों के निवासियों की जीवन की दशाओं को प्रस्तुत किया गया है। मुंबई के अधिक मलिन बस्ती निवासियों के पास जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की कमी है। सरकार द्वारा अनेक मलिन बस्ती को अधिसूचित किए जाने के बावजूद 52 व्यक्ति प्रति नल के औसत की तुलना में कुछ मलिन बस्तियों में एक नल को हजार से अधिक व्यक्तियों द्वारा आपस में साझा किया जाता है। एक-तिहाई परिवारों को बिजली उपलब्ध नहीं है अधिकांश परिवार सामुदायिक शौचालयों को साझा करते हैं। इससे प्रदर्शित होता है कि मलिन बस्तियों में जीवन में सुधार लाने के लिए अभी भी बहुत से कार्य किए जाने हैं। अनेक सरकारी नीतियों के बावजूद सामुदायिक सहभागिता के जरिए मलिन बस्ती निवासियों के जीवन को बेहतर करने की आवश्यकता है।

ग्रेस बी. मुंडू और आर.बी. भगत
‘मलिन बस्ती’ की रूढिवादी धारणा (स्टीरियोटाइप) से परेः अमृतसर में मलिन बस्तियों का सामाजिक शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य

एक नगर में मलिन बस्ती को एक निर्धन क्षेत्र के रूप में समझा जाता है और ऐसा माना जाता है कि सभी मलिन बस्ती निवासी एक समान होते हैं। मौजूदा शोध-पत्र किसी मलिन बस्ती के भीतर असमानता के मुद्दे से सम्बन्धित सूक्ष्म स्तरीय प्रबन्ध का अध्ययन करने का एक प्रयास है। असमानता का अध्ययन विभिन्न स्तरों पर किया गया हैः जैसे कि राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, नगरीय परन्तु किसी मलिन बस्ती के भीतर नहीं। किसी नगर की तरह मलिन बस्ती एक विजातीय सत्व है जिसमें विभिन्न वर्गों के निर्धन लोग एक ही स्थान तथा निवास स्थानों का साझा करते हैं। निष्कर्षों से पता चलता है कि मलिन बस्ती निवासियों में स्पष्ट असमानता है जैसा कि उनके निर्मित माहौल तथा सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्रों से स्पष्ट है।

जगसीर सिंह
शहरी भारत में निम्न आय की किराएदारी आवास-व्यवस्था की अत्यावश्यकता

भारत में आवासीय नीति परम्परागत रूप से किराएदार बाजारों के खर्च पर स्वामित्व आधारित समाधानों की ओर झुकी हुई है। हमारा तर्क है कि इससे निम्न आय वाले परिवारों के लिए निम्न इष्टतम आर्थिक परिणाम उत्पन्न हुए हैं। यह तर्क कम आय वाले परिवारों की प्रकृति के विस्तृत सैद्धान्तिक मूल्यांकन विशेष तौर पर उनकी आय सम्बन्धी उतार-चढ़ाव, धन आबंटन एवं गतिशीलता की आवश्यकता पर आधारित है और निष्कर्ष निकाला जाता है कि स्वामित्व वाली आवास व्यवस्था ऐसे परिवारों की जोखिम सम्बन्धी रूपरेखा के लिए अनुपयुक्त है। विश्लेषण से प्रकट होता है कि किराएदारी की आवास व्यवस्था से परिवारों के धन के अवांछनीय उतार-चढ़ाव का जोखिम कम होता है और इसलिए यह निम्न आय वाले परिवारों के लिए अत्यन्त आवासीय समाधान है। परिणामस्वरूप पर्यावरण की नीति द्वारा निम्न-आय वाले परिवारों की अव्यक्त आवासीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किरायेदारी आवासीय स्टॉक का सृजन अवश्य ही प्रोत्साहित प्रत्याशित वृद्धि को ध्यान में रखते हुए किरायेदारी की आवास व्यवस्था का संवर्धन शहरी आश्रय की वृहत समस्या का समाधान करने में भी महत्वपूर्ण होगा। आज भारतीय नगरों में निम्न-आय की किरायेदारी आवास व्यवस्था की अत्यंत आवश्यकता है।

आनंद सहसरनामन
शहरी फैलाव में अनौपचारिक जल-खुदाईः सुसवाही, वाराणसी का मामला

अनुवीक्षित वैयक्तिक जल-खुदाई पर्यावरण के लिए खतरा बनती है। इसके अलावा, अव्यवस्थित शहरी फैलाव में अपर्याप्त सफाई-व्यवस्था से धरातलीय जल का संदूषण होता है। दोनों प्रक्रियाओं के साथ-साथ होने से समाज के उस अतिसंवेदनशील वर्ग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो निवेश करने की असक्षमता की वजह से संसाधन (जल) नहीं प्राप्त कर रहे होते हैं। तथा वही इससे पीड़ित होंगे जब दुर्लभ वस्तु की उच्च प्रत्याशित कीमत की वजह से गुणवत्ता का स्तर अप्रयोज्य संसाधन स्तर पर गिर जाएगा। सुसवाही में 240 परिवारों के सर्वेक्षण के आधार पर एक शोध-पत्र में दो उल्लिखित दशाओं के दृष्टिगत पानी की मांग को पूरा करने के लिए परिवार की अनुकूलन कार्यनीतियों की चर्चा की गई है। अव्यवस्थित शहरी फैलाव में पानी के लिए मौजूदा निजी व्यवस्था बहुत से कारकों द्वारा प्रेरित हैः पानी की उपलब्धता, लगभग शून्य प्रचालन लागत तथा पहचान का मुद्दा। ऐसी स्थिति में पर्यावरणिक संसाधनों, मौजूदा सत्ता से संबंध जो ऐसे नियंत्रण तथा जल-समृद्ध क्षेत्र में सामाजिक राजनीतिक तथा पर्यावरणिक विवक्षाओं को भी परिभाषित करता है पर राजनीतिक एवं आर्थिक नियंत्रण की प्रणालियों का विश्लेषण करने के लिए राजनीतिक पारिस्थितिकी प्रस्ताव महत्वपूर्ण हो सकता है।

बिक्रमादित्य के. चौधरी
सहभागितापूर्ण अभिशासन में पहलें: मुम्बई में हालिया प्रयोग

इस शोध-पत्र में मुम्बई के मेगासिटी के परिप्रेक्ष्य में सहभागिता अभिशासन में किए जा रहे कुछ हालिये प्रयोगों पर चर्चा की गई है। स्थानीय क्षेत्रीय नागरिक समूह, क्षेत्रीय जमा तथा क्षेत्रीय समिति सहभागिता/भागीदारी के ढ़ांचे के अंतर्गत स्थानीय शासन में नागरिकों की सहभागिता के दीर्घ मार्ग में ऐसे उदाहरण हैं जो 1990 के दशक में शासन में परिवर्तन तथा नागरिकों एवं उनके संघों की अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी पर बल के परिणामस्वरूप शुरू हुआ। सरकारी कार्यक्रमों जैसे कि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) में शासकीय सुधारों जैसे कि बड़े पैमाने पर सहभागिता सामुदायिक कानून पर बल दिया गया है। इसी पृष्ठभूमि में नागरिक तथा उनके विभिन्न मतों के संघ सहभागिता के विभिन्न प्रतिमानों के संबंध में प्रयोग करने में व्यस्त हैं। तथापि, और भी गहन जांच से प्रदर्शित होता है कि इन पहलों में से अधिकांश पहलें मध्य वर्गीय संभ्रांत नागरिकों के प्रयोग हैं जिनमें गरीब शामिल नहीं है तथा वार्ड समितियों एवं साथ ही निर्वाचित प्रतिनिधियों जैसी सहभागिता के संवैधानिक दृष्टि से दिए गए स्थानों की उपेक्षा की गई है। इस बात के होते हुए भी, इस पत्र का मुम्बई में की गई पहलों की सहायता से निष्कर्ष है कि ऐसे प्रयोगों से राजनीतिक दायरा बढ़ता है तथा इनमें भविष्य में बेहतर अभिशासन लाने की प्रत्याशा निहित होती है।

बिंटी सिंह
गैर-कर राजस्व को बढ़ानाः यूएलबी के राजस्व स्त्रोतों के रूप में संपत्ति अस्तियां

नगरीय संपत्ति आस्तियां भारत में स्थानीय शासनों की आय के विभिन्न स्रोतो में अपेक्षाकृत अल्प-शोधकृत एवं अल्प-प्रयुक्त स्रोत हैं। इन संपत्ति आस्तियों से उत्पन्न होने वाले गैर-कर राजस्व, हालांकि महत्वपूर्ण है, स्थानीय तथा राज्य सरकारों द्वारा धारित इस परिसंपत्ति आधार के पर्याप्त वित्तीय मूल्य को शायद ही प्रदर्शित करना शुरू करते हैं। इस पत्र में भारत में राज्य तथा स्थानीय सरकारों के विभिन्न आय स्त्रोतों के बीच इन आस्तियों की अप्रयुक्त राजस्व अन्तनिर्हित शक्ति रेखांकित की गई है। इसमें विश्वभर की कुछेक भूमि प्रबंधन पद्धतियों के मानदण्ड़ों को भी उजागर किया गया है ताकि भारत के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता एवं प्रयोज्यता को समझा जा सके। इन आकड़ों तथा संबंधित साहित्य की समीक्षा के आधार पर यह पत्र संपत्ति आस्ति स्रोतों के जरिए राजस्व सृजन को अधिकतम करने के लिए एक मूलभूत ढांचा प्रस्तुत करता है।

सुजाता श्रीनिवासन
हरित एवं संधारणीय नगरों के लिए सूचना एवं संप्रेषण प्रौद्योगिकी

वर्तमान में विश्व की अधिकांश जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में रहती है तथा वर्ष 2020 तक यह बढ़कर 60% हो जाएगी। भारत में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत को पार कर गया है तथा नगर के संसाधनों पर वृहत दबाव डालते हुए त्वरित गति से बढ़ रही है। शहरी क्षेत्रों में विश्व की ऊर्जा की न केवल तीन-चौथाई की खपत होती है बल्कि ये कुल हरित गैस उत्सर्जनों का 80% के लिए उत्तरदायी भी हैं। ऊर्जा एवं अन्य संसाधनों के इस्तेमाल को सूचना एवं संप्रेषण प्रौद्योगिकी (आईसीटी) के नवीन प्रयोग द्वारा इस्टतम बनाया जा सकता है। सफल नगर ऐसा आई सी टी का विभिन्न क्षेत्रों जैसे कि परिवहन, स्वास्थ्य परिचर्या, शिक्षा, निर्माण नियंत्रण, मनोरंजन, सलामती एवं सुरक्षा इत्यादि में इस्तेमाल करके ऐसा करेगा। सभी सूचना स्रोतों को जोड़ते हुए तथा वास्तविक समय में सूचना के साझा को समर्थ करने वाले सर्वव्यापक ब्राडबैंड पर विनिर्मित हैं। ब्रॉडबैंड बिजली, सड़क और पानी के बाद अगली जरूरत है और नगर के योजनाकारों तथा नगर प्रशासन को इसे ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है।

प्रकाश कुमार
शहरी सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) परियोजनाओं के कार्यान्वयन हेतु सक्षम ढांचे का विकास

भारत में, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल शहरी सेवाओं की व्यवस्था को बेहतर करने के लिए नीतिगत पहलों में एक प्रमुख स्थान बना रहा है। पीपीपी परियोजनाओं को कार्यान्वित करने में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) की दुर्बल सक्षमताओं को पीपीपी मॉडल के इस्तेमाल में एक बड़ी अड़चन के रूप में पहचाना गया है। इससे पीपीपी परियोजनाओं के संदर्भ में यूएलबी में दुर्बल सक्ष्मताओं पर ध्यान देने के लिए व्यवस्थित प्रक्रिया की आवश्यकता उजागर होती है। उस दिशा में प्रथम कदम शहरी पीपीपी परियोजना के जीवन चक्र की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए सक्षमताओं की पहचान है। ये सक्षमताएं व्यापक साहित्यिक समीक्षा तथा शहरी पीपीपी परियोजनाओं से जुड़े पणधारियों के साथ अर्ध-संरचनात्मक साक्षात्कारों के साथ दोमुखी अनुसंधान कार्यनीति द्वारा अभिज्ञात की गई थी। अभिज्ञात सक्षमताएं उस ढांचे के रूप में निरूपित की जाती हैं जिनमें बारह सक्षमताएं, जो शहरी पीपीपी परियोजनाओं के चरणों पर आधारित चार श्रेणियों के तहत समूहीकृत है, शामिल है। सक्षमता ढांचे शहरी स्थानीय निकायों में सक्षमता के विकास के लिए कार्यनीतियों को आकार देने में नीति निर्माताओं को सहायता कर सकते हैं।

गणेश ए. देवाकर और सत्यनारायण एन. कालीदिंडी
दिल्ली में शहरी गरीबों को सेवाकृत भूमि की सुपुर्दगी में सार्वजनिक-निजी भागीदारी

राष्ट्रीय आवास तथा पर्यावास नीति (एनएचएचपी) में प्रतिज्ञान किया गया है कि सार्वजनिक निजी सहभागिता नगरों तथा शहरों की समावेशी तथा संधारणीय वृद्धि, शहरी आवास के लिए व्यापक बैकलॉग और सार्वजनिक क्षेत्र की एजेन्सियों एवं संस्थाओं की फैसिलिटेटर संबंधी भूमिका के समग्र परिप्रेक्ष्य में वहनीय आवास की त्वरित आपूर्ति करने के लिए अनिवार्य है। निम्न-आय वाली आवास-व्यवस्था इन पीपीपी नीतियों का अभिन्न हिस्सा रही है। इस पत्र में विभिन्न मॉडलों का विश्लेषण कार्यान्वयन तथा निर्बधनों का विश्लेषण किया गया है जो भारत के विभिन्न राज्यों में उत्पन्न हुए हैं, तथा विधियों, कार्यान्वयन तथा निर्बधनों का विश्लेषण किया गया है तथा इसमें दिल्ली में वहनीय आवास-व्यवस्था तथा गरीब व्यक्तियों को सेवाकृत भूमि की प्रदानगी के लिए एक पीपीपी दृष्टिकोण सुझाया गया है। इस पत्र में इस संबंध में केन्द्र तथा राज्य सरकार की विभिन्न पहलों की रूपरेखा भी दी गई है।

वी.के. धर
शहरी भूखण्डः पूर्वोत्तर भारत में शहरों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता

इस पत्र में शहरी स्तर पर नवीनतम उपलब्ध भारत की जनगणना से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में मूलभूत सुविधाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। जटिल भौतिक क्रिया विज्ञान की दशाओं वार्षिक बाढ़, सामाजिक तथा राजनीतिक असंतोष की समस्याएं, लंबी अन्तरराष्ट्रीय सीमाएं इस क्षेत्र में चिंता के क्षेत्र हैं। यह लंबी अवधि तक अंधकार में रहा तथा हाल ही से त्वरित शहरीकरण शुरू किया। इस पत्र में शहरी मूलभूत सेवाओं अर्थात् जल, स्वच्छता तथा बिजली, की विभिन्न आकार श्रेणी वाले शहरों में उपलब्धता का विश्लेषण किया गया है। इसमें सामाजिक-आर्थिक तथा जनांकिकी पैरामीटर के साथ उपलब्धता का संबंध समझने का भी प्रयास किया गया। इस अध्ययन से इंगित होता है कि भौगोलिक विशिष्टताएं यूबीएस की उपलब्धता को कुछ सीमा तक निर्धारित करती हैं। यूबीएस का सामाजिक-आर्थिक एवं जनांकिकी पैरामीटर के साथ संबंध उतना स्पष्ट नहीं है जितना कि अन्य विद्वानों द्वारा सुझाया गया था।

भास्वती दास तथा डिम्पी निपुन
Year: 
2012