शहरी भारत 2011 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 19 जनवरी 2016 - 1:28pm
भारत में शहरीकरण तथा मूलभूत सुविधाओं तक पहुँच

मूलभूत सुविधाओं जैसे कि बिजली, पेय जल, शौचालय की सुविधा, अपशिष्ट जल निकास तथा साफ-सफाई तक पहुँच, शहरीकरण की गुणवत्ता के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। उदाहरण के लिए भारत में जनगणना, 2001 के अनुसार 13 प्रतिशत शहरी परिवारों को बिजली उपलब्ध नहीं है, 16 प्रतिशत को स्वच्छ पेय जल उपलब्ध नहीं है तथा 27 प्रतिशत को शौचालय सुविधा उपलब्ध नहीं है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-3 के अनुसार इसमें 2005-06 में अत्यधिक गिरावट आई है किन्तु फिर भी शहरी क्षेत्र में 7 प्रतिशत परिवार को बिजली उपलब्ध नहीं है, 8 प्रतिशत को स्वच्छ पेय जल उपलब्ध नहीं है तथा 17 प्रतिशत को शौचालय सुविधा नहीं है। शहरी परिवारों का करीब 1/5 भाग किसी जल-निकास सुविधा में कवर नहीं है। इस अध्ययन में 28 राज्यों, 7 संघ राज्य क्षेत्रों तथा करीब 5000 भिन्न-भिन्न नगरों तथा शहरों को कवर करते हुए राज्य तथा नगर/शहरी स्तरों पर मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता का विश्लेषण किया गया है। मूलभूत सुविधाओं के पैटर्न की क्षेत्रीय विषमता में राज्य स्तर पर शहरीकरण के स्तर का ध्यानपूर्वक अनुसरण किया गया है। शहरी क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं की अल्प उपलब्धता वाले राज्य शहरीकरण के निम्न स्तर के राज्य भी हैं। दूसरी ओर, शौचालय सुविधा एवं सफाई व्यवस्था को छोड़कर मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता नगरों एवं शहरों की आकार संबंधी श्रेणियों के अनुरूप अलग-अलग है।

आर.बी. भगत
शहरी विकास के लिए शहरी स्थानीय निकायों का क्षमता निर्माणः गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के कार्यकलाप के लिए कुछ उदीयमान क्षेत्र

संविधान (चौहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1992 के अधिनियम के बाद नगर पंचायत, नगर परिषद तथा नगर निगम नगर तथा शहरों में शहरी नीतियां एवं कार्यक्रम कार्यान्वित करने हेतु स्थापित की गई हैं। अन्य शहरी विकास प्राधिकारियों के साथ ये शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) शहरी क्षेत्रों में निवास कर रहे नागरिकों के समाजिक-आर्थिक मानदण्डों में सुधार लाने के लिए कार्यरत हैं। किन्तु अनुभव से प्रदर्शित हुआ है कि स्वशासन की ये संस्थाएं सामाजिक विकास तथा समाजिक न्याय के लिए योजना तैयार करने और संविधान की बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध मामलों के संबंध में योजनाओं को कार्यान्वित करने में अनेक कारणों से, सफल नहीं रही हैं। यूएलबी के कार्यकरण की गहन समीक्षा से प्रकट होता है कि शहरी आयोजना, वित्तीय संसाधनों, स्थानीय सामुदायिक भागीदारी तथा शहरी सेवाओं की प्रदानगी के क्षेत्रों में उनकी क्षमताओं, कौशल एवं सामर्थ्य का उन्नयन किया जा सकता है यदि वे निजी क्षेत्र तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों के साथ मिलकर कार्य करेंगे। जैसा कि इस शोध-पत्र में चर्चा की गई है, गैर-सरकारी क्षेत्रों के कार्यकलाप के साथ शहरी निर्धनता उपशमन योजनाओं के अंतर्गत यूएलबी के लिए उदीयमान क्षेत्रों में शहरी आयोजना, वास्तविक लाभार्थियों की पहचान तथा चयन, सामाजिक कल्याण सेवाएं, निर्वाचित यूएलबी प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण देना, सामुदायिक परिसंपत्तियों का अनुरक्षण, शहरी सेवाओं की प्रदानगी का सुदृढ़ीकरण, शहरी स्थानीय अभिशासन के कार्यकरण में पारदर्शिता, शहरी सुशासन तथा आपदा प्रबंधन का नवीकरण शामिल है। लेखक ने आगाह किया है कि गैर-सरकारी संगठनों तथा शहरी स्थानीय निकायों के बीच काफी हद तक निष्कपट भागीदारी शहरी विकास को कार्रवाई में परिणत करने के लिए पारस्परिक समझ-बूझ तथा प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है। राज कुमार सिवाच

राज कुमार सिवाच
भारतीय नगरों में व्यवसाय करने को सुलभ करने हेतु सुधारों की पहचान

उदारीकृत एवं वैश्विकृत अर्थव्यवस्था के वर्तमान परिदृश्य में चिरस्थायी बने रहने हेतु नगरों को प्रतिभागी सत्वों के रूप में विकसित होना है। अवस्थिति संबंधी लाभ से ही नगरों की स्पर्धात्मकता का इसके बाद निर्णय नहीं किया जा सकता है। आजतक व्यवसाय प्रचालनों के लिए आधार के रूप में नगरों की स्वीकार्यता के लिए उन पहलुओं की बहुलता अपेक्षित है जिनके संबंध में उन्हें अपनी उत्कृष्टता प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। समष्टि आर्थिक दशा में संवर्धनों के बावजूद, व्यवसाय चलाने में औपचारिकाताओं को शुरू अथवा स्वीकार करने के लिए अपेक्षित समय भारतीय नगरों में अत्यधिक के रूप में अनुभूत है। नए व्यवसाय उद्यमों की स्थापना विधिक, प्रशासनिक तथा नौकरशाही अड़चनों द्वारा बाधित होती है जो अनुज्ञा प्राप्त करने अथवा किसी संपत्ति को पंजीकृत करवाने के मार्ग में आती हैं, जिनके परिणामस्वरूप किसी व्यवसाय को शुरू करने अथवा प्रभावी ढ़ंग से चलाने में उँची लागत आती है एवं विलंब होते हैं।

वर्तमान अध्ययन में व्यवसाय करने तथा इस संबंध में नगरों की केस स्टडी की तुलनात्मकता की विषय-वस्तु पर विश्व बैंक के तत्वावधान में शुरू किए गए अध्ययन के निष्कर्षों का विश्लेषण किया गया है। वृहत्तर संख्या में नगरो के संबंध में कार्य शुरू करते समय तथा प्राथमिक सर्वेक्षणों के आधार पर भी यह अध्ययन निर्माण क्षेत्र तथा संपत्ति पंजीकरण में उन उत्तम पद्धतियों पर केन्द्रित है जिन्हें कार्य-निष्पादन में सुधार लाने के लिए अन्य नगरों में अंगीकृत/अनुकूलित किया जा सकता है। अध्ययन में प्रदर्शित हुआ है कि बंगलौर उन कुछेक नगरों में से एक है जहां निर्माण अनुज्ञा प्राप्त करने और संपत्ति पंजीकृत करवाने में न्यूनतम समय एवं लागत आती है। कोलकाता निर्माण अनुज्ञा प्राप्त करने में सर्वाधिक खर्चीला तथा संपत्ति पंजीकृत करने के लिए सर्वाधिक समय-खपाने तथा संपत्ति पंजीकृत करवाने में सर्वाधिक खर्चीला नगर है। जेएनएनयूआरएम के अंतर्गत अनेक नगरों ने स्थानीय शासन में सुधार शुरू किए हैं। नगरों द्वारा जेएनएनयूआरएम कार्यक्रम के तहत किए जा रहे सुधारों को संयोजित करने पर इस अध्ययन की प्रकृति समकालिक है तथा यह उन नगरों के लिए उपयोगी होगा जो अपने कार्यनिष्पादन एवं स्पर्धात्मकता को बेहतर करने की प्रतिकृति के लिए सर्वोत्तम पद्धतियों की तलाश कर रहे हैं।

देबोलिना कुंडू
भारतीय नगरों में ऐतिहासिक जिलों का कायाकल्पः नए प्रस्ताव के लिए अनुभव, चुनौतियां तथा कुछ विचार

त्वरित शहरीकरण अपने उद्भव के साथ निर्धनता का शहरीकरण तथा शहरी भूमि तथा संसाधनों पर दबाव उत्पन्न कर रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में, नगरों तथा शहरों के केन्द्रीय भाग में प्रायः (किन्तु न कि अनन्य रूप से) पाए जाने वाले ऐतिहासिक क्षेत्रों का संरक्षण एवं कायाकल्प अत्यधिक महत्व रखता है। अनियंत्रित एवं कभी-कभार अनियोजित, असंगत नीति, खंडित संस्थागत ढ़ाचा, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, तथा कार्यान्वयन संगठनों की सीमित क्षमताओं के साथ संयोजित आर्थिक विकास, के परिणामस्वरूप प्रायः नगरों के भीतर ऐतिहासिक जिलों की उपेक्षा एवं विनाश होता है। ऐसा विकसित तथा विकासशील जगत, दोनों के संदर्भ में देखा गया है। शहरी योजनाकारों तथा नीति-निर्माताओं के लिए, ऐतिहासिक जिले सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयोजना संबंधी दुविधाओं में से एक बुद्धि एवं विकास आवश्यकता बनाम संरक्षण की अनिवार्यता को मूर्त रूप देते हैं।

भारत में संरक्षण में परम्परागत रूप से ऐतिहासिक भवनों तथा स्थलों के परिरक्षण पर बल दिया गया है और हाल ही में इसमें न केवल भवनों तथा समस्त जिलों, या नगरों के भीतर अंचलों अथवा क्षेत्रों का पुनरूद्धार करने का विचार अंगीकार किया जाना शुरू किया गया है। नवीन प्रस्ताव विद्यमान हैं किन्तु इनकी अभी प्रतिकृति की जानी है अथवा संवर्धन किया जाना है। भारत में शहरीकरण, आयोजना तथा शासन के परिप्रेक्ष्य के मद्देनजर, इस शोध-पत्र द्वारा इस प्रक्रिया में चुनौतियों की तलाश की गई है तथा भारतीय शहरों तथा नगरों में ऐतिहासिक क्षेत्रों के अधिक समग्रतावादी प्रभावी तथा संधारणीय पुररूत्थान हासिल करने के लिए कुछ विचार सुझाए गए हैं।

शिप्रा नारंग सूरी
नगरवार निर्धनता न्यूनीकरण कार्यनीति प्रस्ताव के जरिए शहरी निर्धनों की समस्याओं पर ध्यान देना

आज उद्भूत शहरी भारत के समक्ष चुनौतियां सभी के लिए सेवाओं एवं रोजगार की व्यवस्था, करना है, दूसरे शब्दों में, इसके सभी नागरिकों को उन्नत जीवन-दशाएं एवं जीविका समान रूप से उपलब्ध कराना है। विकास क्षेत्र में कार्यरत व्यवसायियों के समक्ष उपस्थित प्रश्न यह है कि किस तरह शहरी निर्धनों की आवश्यकताओं को उपायकुशलता से एवं सक्षमतापूर्वक आत्मसात किया जाना है तथा समावेशी एवं सुशासित नगर बनाने हैं।

भारत सरकार विभिन्न कार्यक्रमों एवं नीतियों के कार्यान्वयन के जरिए इस दिशा में प्रयास रही है, सर्वाधिक हालिया संचालित सुधार जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) हैं। निर्धनों के लिए राष्ट्रीय कार्यनीति संबंधी भारत सरकार-यूएनडीपी परियोजना के तहत इस प्रमुख शहरी विकास कार्यक्रम की अनुक्रिया के रूप में, ग्यारह नगरों के लिए शहरी निर्धनता न्यूनीकरण कार्यनीतियां (यूपीआरएस) तैयार की गई। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य मूलभूत सेवाओं, आश्रय तथा जीविकाओं पर बल देते हुए शहरी निर्धनों के लिए समेकित कार्यनीतियां बढ़ाना था जिससे समावेशी शहरी विकास कायम रह जाता है। यह शोध-पत्र ग्यारह नगरों में शहरी निर्धनों की दशाओं के संयोग के साथ शुरू होता है और मलिन बस्ती से मुक्त नगरों की खोज में कतिपय मार्गदर्शी सिद्धांतों पर पहुँचने का प्रयास करता है। यह व्यापक प्रस्तावों का भी सुझाव देता है जिन्हें किसी नगर के लिए निर्धनता न्यूनीकरण कार्यनीति तैयार करते समय जांचे जाने की आवश्यकता है।

परमिता दत्ता डे
विकेन्द्रीकृत शहरी शासन तथा संसाधन जुटाने के लिए इसकी विवक्षाएं: पश्चिम बंगाल की अनुभूति

भारत में नगरीय सरकारों को हाल के वर्षों में वृद्धिगत जनांकिकी एवं सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ा है। शहरीकरण की वर्तमान गति हालांकि साधारण प्रकृति की है, से सामान्य तौर पर शहरी अवसंरचना की व्यवस्था के लिए तथा विशेषकर शहरी मूलभूत सेवाओं के लिए गंभीर समस्याएं सृजित होती रही हैं। राज्यों की जर्जर वित्तीय स्थितियों तथा सुस्त संस्थागत संरचना और अधिकांश नगरीय सरकारों की कमजोर वित्तीय अवस्था से यह समस्या और भी बिगड़ जाती है। हाल के वर्षों में, भारत की शहरी अवसंरचना के धारणीय विकास को सुकर करने के लिए सरकार के प्रयास 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (सीएए) 1992 के रूप में पराकाष्ठा पर पहुँचते हैं। इस अधिनियम में स्थानीय स्वशासन के सिद्धान्त को मान्यता दी गई है तथा शहरी स्थानीय शासन को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

अतः सुसंगत प्रश्न यह है कि किस हद तक यह संवैधानिक संशोधन सफल है। इस पृष्ठभूमि पर इस शोध-पत्र में उपलब्ध द्वितीयक आंकड़ो की सहायता से, पश्चिम बंगाल (भारत का एक राज्य जहां 74वें सीएए के आगमन के पूर्व भी नगरीय सुधार का समृद्ध इतिहास है) में विकेन्द्रीकृत शहरी अभिशासन की प्रक्रिया एवं प्रगति का मूल्यांकन करने का सामान्य तौर पर 74वें संवैधानिक संशोधन के परिणामस्वरूप तथा विशेषतौर पर संसाधन जुटाने के लिए इसकी विवक्षाओं के दृष्टिगत प्रयास किया जाता है।

सौम्यादीप चट्टोपाध्याय
विकासशील देशों में शहरी आवास व्यवस्था - एक समग्र दृष्टिकोण

1990 के दशक के बाद में विकासशील देशों में शहरी आवास के लिए दृष्टिकोण निम्न आय वर्गों के लिए विशेष परियोजनाओं से परिवर्तित होकर आवासीय क्षेत्र के विकास की ओर समग्र रूप से अभिमुख हो गया है। 'समग्र क्षेत्र' के विकास को समझना विरले ही साहित्य में प्रतिबिम्बित होता है। अतः शहरी आवास व्यवस्था की विविधता एवं जटिलता की समग्रतावादी समझ को विकसित करने की आवश्यकता है। इस शोध-पत्र में नीतियों के जरिए व्यष्टि स्तरीय सिद्धान्तों से समष्टि स्तरीय पद्धतियों एवं मुद्दास्वरूप उनके परिणामों तक शहरी घरों के निर्माण की संकल्पना की गई है। इसमें साहित्य से विकसित शहरी आवास-व्यवस्था के संबंध में समग्रतावादी परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत किया गया है और तथा उसके बाद उन मुद्दों को इंगित किया गया है जो व्यवसायियों एवं शोधकर्ताओं के लिए सरोकार रखते हैं।

एस. ब्रिंथा लक्ष्मी, एल.एस. गणेश और डी. मालती
शहरी अभिशासन तथा नागरिक की भागीदारी की भूमिका-भारत के लघु तथा मध्यम शहरों का मामला

लघु तथा मध्यम शहरों में शहरी अभिशासन अल्प वित्तीय संशोधनों अपर्याप्त प्रशासनिक एवं प्रबंधकीय क्षमता की चिरकारी समस्याओं से ग्रस्त हैं। निधियों की कमी की वजह से उनमें से कई उनके प्रचालन तथा अनुरक्षण अपेक्षाओं के लिए शासनों के उच्चतर स्तर से प्राप्त राजस्व अनुदानों पर अत्यधिक निर्भर हैं। निरंतर वृहत राजस्व घाटों के कारण चिरकारी राजकोषीय दुर्बलता से स्थानीय शासन का कार्यकरण छीन हो गया है जिसके परिणामस्वरूप मूलभत सेवाओं का कुप्रबंधन पैदा हुआ है। स्थानीय नागरिकों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि उन्हें अपने अवस्थान की समस्याओं की व्यापकता की पूर्ण समझ है और वे नगरीय अधिवासियों के साथ स्वस्थ एवं सार्थक संबंध विकसित कर सकते हैं। तथापि, इन निवास-स्थानों में नागरिकों की भूमिका अत्यंत सीमित है। वर्तमान शोध-पत्र जेएनएनयूआरएम के तहत शहरी सुधारों के परिप्रेक्ष्य में लघु तथा मध्यम शहरों में शहरी अभिशासन के मौजूदा परिदृश्य तथा इन निवास स्थानों में मूलभूत सेवाओं की मौजूदा स्थिति को बेहतर करने के लिए स्थानीय लोगों की भागीदारी की समीक्षा करने की एक पहल है। इस शोध पत्र में बेहतर वित्तीय प्रबंधन तथा शहरी अभिशासन में नागरिकों की अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी के लिए नवीन मॉडल की आवश्यकता देखी गई है। इस शोध-पत्र में इन शहरों में स्थानीय शासनों की नगरीय सेवाओं, पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व को बेहतर करने के लिए नियमित अंतराल पर नियमित नागरिक रिपोर्ट कार्ड प्रणाली की पुरजोर अनुशंसा की गई है।

सतपाल सिंह
Year: 
2011