शहरी भारत 2010 | जुलाई-दिसम्बर

Submitted by niuaadmin on 19 जनवरी 2016 - 12:05pm
भारत के शहरों में हरित क्षेत्र का संरक्षण

शहर के पार्क/उद्यान तथा शहरों के निकट प्राकृतिक वनस्‍पति हरित संपत्‍त‍ियां हैं जो शहरों में या इनके नजदीक रहने वाले लोगों के विविध पर्यावरणीय, सामाजिक और शैक्षणिक लाभों के लिए उत्‍तरदायी हैं। शहर के धारणीय विकास के सीधे सूचकों में से एक शहर में और इसके आस-पास हरित क्षेत्रों की गुणवत्‍ता और मात्रा है। पिछले दो दशकों में वैज्ञानिक प्रमाणों में शहरी संस्‍कृति की अनेक समस्‍याओं में सुधार के लिए शहरी सामाजिक पारीस्थितिकीय प्रणालियों में हरित क्षेत्रों की अत्‍यधिक आवश्‍यकता पर बल दिया गया है। विकसित तथा विकासशील दोनों अर्थव्‍यवस्‍थाओं में बडे शहरों के निवासी शहरी हरित क्षेत्र के रखरखाव और सृजन के लिए भुगतान करने के इच्‍छुक दिखाई पड़ते हैं बशर्ते संबंधित सरकारें इस राशि को बुद्धिमतापूर्ण ढ़ंग से और उचित रूप से खर्च करें। इस दस्‍तावेज में निवासियों की दृष्टि से शहरी हरित क्षेत्रों के प्रायोगिक मूल्‍य से संबंधित कुछ अध्‍ययनों पर विचारविमर्श किया गया है तथा गुणवत्‍तापूर्ण शहरी हरित क्षेत्रों की आवश्‍यकता पर बल दिया गया है।

प्रदीप चौधरी
आईटी और आईटी सक्षम सेवाएं: स्‍थानीय अनौपचारिक सेक्‍टर अर्थव्‍यवस्‍था पर प्रभाव और समावेशी वृद्धि

भारत ऐसी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों जो अपने प्रचालनों को सस्‍ती मजदूरी वाले क्षेत्रों में स्‍थानांतरित कर रही हैं, का एक महत्‍वपूर्ण गंतव्‍य स्‍थल बन चुका है। अधिकांश विकसित देश जनसंख्‍या की बढ़ती आयु की समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं ज‍बकि भारत में 19 वर्ष से कम उम्र के 500 मिलियन लोग हैं। हाल के अध्‍ययनों में भारत में रोजगार की प्रवृत्तियों में वस्‍तु उत्‍पादन से अमूर्त परिसंपत्तियों के उत्‍पादन की ओर बड़े परिवर्तन को दर्शाया गया है। आईटी सेक्‍टर में, 2002-2007 के दौरान रोजगार 770 प्रतिशत बढ़ा है। आईटी सेक्‍टर ने औपचारिक सेक्‍टर के लिए लगभग 80% रोजगार सृजित किए हैं और अनौपचारिक सेक्‍टर के लिए मात्र 20%। संबंधित राज्‍य सरकारों के सक्रिय समर्थन के कारण राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के गुडगांव और नोएडा सूचना और संप्रेषण प्रौ़द्योगिकी (आईसीटी) के उभरते क्षेत्र बन गए हैं।

इस दस्‍तावेज में गुडगांव और नोएड़ा की वृद्धि के विश्‍लेषण के लिए स्‍थानीय अनौप‍चारिक अर्थव्‍यवस्‍था पर आईसीटी सेक्टर के प्रभाव पर मुख्‍यतः ध्‍यान दिया गया है। इस क्षेत्र में वृद्धि की प्रवृत्तियों को दर्शाते हुए, गुडगांव और नोएडा में आईटी से पूर्व और आईटी के बाद के सेक्‍टर विकास की तुलना करते हुए रोजगार की प्रवृत्‍त‍ियों को देखा गया है। आंकडा विश्‍लेषण दर्शाता है कि पिछले दशक के दौरान आईसीटी सेक्‍टर के राष्‍ट्रीय आय के एक मुख्‍य वृद्धिकर्ता होने के बावजूद अनौपचारिक में आय या रोजगार में इसका कोई महत्‍वपूर्ण प्रभाव नहीं पड़ा। आईसीटी सेक्‍टर अर्थव्‍यवस्‍था के निचले कर्ताओं के लिए सृजित नहीं किया गया है, जैसा एनसीआर में देखा गया है। इस उदीयमान सेक्‍टर ने अनौपचारिक सेक्‍टर में आय में बढ़ते भाग के साथ समावेशी वृद्धि में योगदान नहीं किया है। रोजगार में वृद्धि के साथ अनौपचारिक सेक्‍टर का इस क्षेत्र में विस्‍तार हुआ है, परन्तु इससे आय के अंतर को और बढाते हुए एक्‍सक्‍लूसनरी नीतियों को बढ़ाया है।

शिप्रा मैत्रा
नगरपालिकाओं की क्रेडिट रेटिंग, भारत में शहरी क्षेत्र के वित्‍तपोषण के लिए विकास और निहितार्थ

इस दस्तावेज में पिछले दशक से भारत में शहरी स्‍थानीय निकायों की क्रेडिट रेटिंग के साथ अनुभव का वर्णन किया गया है। इससे नगरपालिका साख गुणवत्‍ता की समझ बढ़ी है तथा इससे परिसंपत्तियों की इस श्रेणी के लिए बड़े वित्‍तीय संस्‍थानों में जागरूकता बढ़ी है। यद्यपि नगरपलिका बाण्डों को उच्‍च साख गुणवत्‍ता आवश्‍यकताओं के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया है, फिर भी साख वृद्धि करके दीर्घकालीन वाणिज्यिक ऋण बाजार विकसित करने की संभावना मौजूद है।

सुजाता श्रीकुमार
मुंबई में जीवन की गुणवत्‍ता

बढ़ते शहरीकरण तथा शहरों की वृद्धि के कारण शहरों द्वारा अपनी जनसंख्‍या को प्रदान किए जा रहे जीवन की गुणवत्‍ता पर विचारविमर्श की आवश्‍यकता है। इस दस्‍तावेज में मुंबई में जीवन के आर्थिक और गैर-आर्थिक आयामों का अनुभवसिद्ध अन्‍वेषण है। मुंबई में आय अधिक है तथा बढ़ रही है जबकि गरीबी बहुत कम है। तथापि, उपभोग व्‍ययों में असमानताएं बढ़ रही हैं जिनका प्रयोग आयों में असमानाओं के प्रॉक्सी के रूप में किया जाता है। तृतीयक क्षेत्र में बढ़ते स्‍वरोजगार के कारण सामाजिक असुरक्षा बढ़ी है और यह चिंता का विषय है। मुंबई में जीवन के गैर-आर्थिक आयामों में, इस दस्‍तावेज में शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, प्रदूषण के स्तरों, आवास और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच के मानव विकास क्षेत्रों पर चर्चा की गई है। इस दस्तावेज के अंत में मानव विकास को मापने का एक प्रयास किया गया है तथा मुंबई के वार्डों के लिए मानव विकास उपाय दर्शाए गए हैं।

संगीता कामदार
भारत में संपत्ति‍ कर सुधार

संपत्ति कर (पीटी) अनेक देशों में स्‍थानीय राजस्‍व का एक महत्‍वपूर्ण स्रोत है, जबकि स्‍थानीय व्‍ययों के वित्‍तपोषण के लिए स्रोत के रूप में इसका प्रायः कम उपयोग किया गया है। भारत में, अनेक स्‍थानीय सरकारों ने संपत्ति करों से संग्रहण में सुधार के लिए प्रशासनिक तथा मूल्‍यांकन सुधार प्रारंभ किए हैं। यह दस्‍तावेज 10 शहरों में नवोन्‍मेषी संपत्ति कर सुधारों के एक अध्‍ययन पर आधारित है जहां इस सुधारों तथा नगरपालिकाओं के राजस्‍व आधार पर इसके प्रभाव की जांच की गई है। वर्तमान सुधार परिसंपत्ति कर के निष्‍पादन में सुधार के लिए एक अच्‍छा उपाय हैं, फिर भी इन उपायों को धारणीय और जवाबदेह बनाने के लिए संरचनागत मसलों जैसे सुधरा हुआ मूल्‍यांकन, कर की बढ़ती मात्रा तथा कर दाता का विश्‍वास का समाधान करना आवश्‍यक है। अध्‍ययन के निष्‍कर्षों से पता चला है कि सुधारों ने संपत्ति कर में प्रणाली सुधार के लिए शहरों को बड़ी सहायता दी है। जेएनएनयूआरएम सुधार कार्यसूची ने शहरों को परिवर्तन लाने के लिए अपेक्षित प्रेरणा दी है, जिससे संपत्ति कर प्रणाली स्‍ट्रीमलाइन होगी तथा शहरों का राजस्‍व आधार मजबूत होगा। अध्‍ययन में एक स्‍वचालित संशोधन की इनबिल्‍ट प्रणाली सहित कर के मूल्यांकन की प्रणाली में परिवर्तन करने का सशक्‍त रूप से अनुमोदन किया गया है। ऐसी कोई प्रणाली तभी धारणी हो सकती है जब इसे समानांतर प्रशासनिक सुधारों के साथ जोड़ दिया जाए।

देबजानी घोष
शहर नियोजन में समावेशी पर्यावरण धारणीय परिवहन सिद्धांतों के सह-लाभों को एकीकृत करने के पथ पर भुवनेश्‍वर

पिछले कुछ दशकों में, भारत के शहरी क्षेत्रों में महत्‍वपूर्ण जनसंख्‍या वृद्धि तथा आर्थिक विकास देखा गया है। विश्‍व की अनेक शहरी प्रणालियों की तरह, भारत के शहर भी जनसंख्‍या के शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति का सामना कर रहे हैं। शहर मोटर चालित वाहनों की तीव्र वृद्धि को नियंतरित करने तथा उसका प्रबंध करने में असमर्थ हैं क्‍योंकि इस लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने के लिए अनेक संस्‍थाएं हैं परन्तु उनके बीच एकीकरण एवं समन्वय का अभाव है। वर्तमान दस्तावेज में भुवनेश्‍वर शहर के समावेशी एकीकृत पर्यावरण की दृष्टि से धारणीय परिवहन (आईआईईएसटी) पहल के उपागम पर ध्‍यान दिया गया है। यह न केवल शहर के परिवहन क्षेत्र के लिए अपितु शहरी पर्यावरण के रूप तथा शहर के निवासियों को मिलने वाले जीवन की संपूर्ण गुणवत्‍ता पर भी एक नया दृष्टिकोण प्रस्‍तुत करता है। बड़ा लक्ष्‍य समावेशी एकीकृत पर्यावरण की दृष्टि से धारणीय परिवहन उपायों का सह-हित लाभ स्‍थापित करना है जिसमें उच्‍च गुणवत्ता का सार्वजनिक परिवहन, पैदल चलने वालों तथा साइकिल चलाने वालों के लिए अलग स्‍थान तथा निजी वाहन प्रयोग को हतोत्‍साहित करने के लिए प्रोत्‍साहन शामिल हैं।

पीयूष रंजन राउत
शहरी कच्‍ची बस्तियों की सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइलः चयनित मिलियन प्‍लस नगरनिगमों के वार्डों में कच्ची बस्ति‍यों की सामाजिक आर्थिक विशेषताओं का एक विश्‍लेषण

इस दस्तावेज में चयनित मिलियन प्‍लस नगरनिगमों के वार्डों में कच्ची बस्ति‍यों की सामाजिक आर्थिक विशेषताओं का एक विश्‍लेषण करने का प्रयास किया गया है। इस अध्‍ययन के लिए अहमदाबाद, बेंगलूर, चेन्नई, दिल्‍ली, ग्रेटर मुंबई, इंदौर, लखनऊ और पटना नगरनिगमों का चयन किया गया है। वार्ड स्‍तर पर सूचकों के दो सैट तैयार किए गए हैं; एक अंदर अवस्थित कच्‍ची बस्तियों के लिए और दूसरा इसके आगे की बस्तियों के लिए। इसके अतिरिक्‍त, विविध सामाजिक आर्थिक सूचनों में अंतर-संबंधों का वार्ड स्‍तर पर विश्‍लेषण किया गया है। विश्‍लेषण का परिणाम चयनित मिलियन प्‍लस नगरनिगमों के वार्ड स्‍तर पर कच्ची बस्ति‍यों की कुछ महत्‍वपूर्ण सामाजिक आर्थिक विशेषताओं को दर्शाता है, जैसे क्‍या ऐसे वार्डों जिनमें कच्‍ची बस्‍ती की जनसंख्‍या का घनत्‍व अधिक है, के निवासियों की सामाजिक-आर्थिक दशाएं ऐसे वार्डों जिनमें कच्‍ची बस्‍ती की जनसंख्‍या का घनत्‍व कम है, के निवासियों की सामाजिक-आर्थिक दशाओं से बेहतर हैं। क्‍या तुलनात्‍मक रूप से अच्‍छी सामाजिक-आर्थिक दशाओं वाली कच्‍ची बस्तियों में अनुसूचित जाति की जनसंख्‍या कम है या अधिक आदि। इसी प्रकार का विश्‍लेषण वार्ड स्तर से पूर्व मिलियन प्‍लस नगर निगमों के लिए किया गया है। अखिल भारतीय स्तर पर तथा मिलियन प्‍लस शहर स्‍तर पर कच्‍ची ब‍स्‍ती के निवासियों की तुलना में अन्‍य शहरी निवासियों का तुलनात्‍मक रूप से अभाव के अनुपात का मूल्‍यांकन किया गया है। इसके अतिरिक्‍त, मिलियन प्‍लस नगर निगमों में कच्‍ची ब‍स्‍ती के निवासियों के बीच तुलनात्‍मक अभाव की जानकारी करने का प्रयास भी किया गया है।

प्रेम कुमार
पीपीपी के लिए सांस्‍थानिक स्‍तर पर तैयार होने का मूल्‍यांकन

भारत अपनी विशाल अवसंरचना कमियों को पूरा करना चाहता है इसलिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) एक प्रमुख रणनीतिक विकल्‍प के रूप में उभरा है। राज्‍य तथा शहरी स्‍तर पर पीपीपी के लिए एक सक्षम वातावरण तैयार करना इसकी सफलता के लिए आवश्‍यक है। पीपीपी के क्षेत्र में साहित्‍य की समीक्षा तथा विशेषज्ञों के साथ विचारविमर्श के माध्‍यम से, इस दस्तावेज में पीपीपी के लिए एक सक्षम वातारण के मुख्‍य तत्‍वों की पहचान की गई है तथा सत्‍यापित किया गया है। अवसंरचना में निजी निवेश को बनाए रखने तथा समर्थन के लिए इसके बाद इन तत्‍वों को सार दिया गया है तथा सूचकांक जो किसी दिए हुए सांस्‍थानिक वातावरण को मजबूत बनाने या तैयार करने के लिए निर्धारित किया गया है, को बनाने के लिए परिकलित किया गया है। इस उद्देश्‍य के लिए एक वैज्ञानिक तकनीक जिसे 'एनालिटिकल हायर्ची प्रोसेस' (एएचपी) के नाम से जाना जाता है, का प्रयोग किया गया है। इसके बाद, हम पीपीपी लागू करने के लिए चयनित भारतीय राज्‍यों के तैयार होने पर इस सूचकांक को लागू करेंगे। यह अभ्‍यास इस सूचकांक की अनुप्रयोज्‍यनीयता को दर्शाता है और हम चर्चा करते हैं कि शहर और राज्‍य स्‍तर, दोनों की सरकारें पीपीपी के सफल कार्यान्‍वयन के लिए अपने सांस्‍थानिक वातावरण में सुधार और बेंचमार्क के लिए इस सूचकांक का कैसे प्रयोग कर सकती हैं।

कीर्ति पोटनुरू और अश्विन महालिंगम
Year: 
2010