शहरी भारत 2010 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 19 जनवरी 2016 - 11:50am
तेरहवां वित्‍त आयोग तथा शहरी स्‍थानीय निकायः भारत में शहरी सुशासन की ओर

तेरहवें वित्‍त आयोग की सिफारिशों में भारत में नगरपालिका वित्‍तपोषणों तथा शासन को दृढ़ करने का व्‍यापक महत्‍व है। आयोग ने स्‍थानीय शहरी निकायों के आबंटन में भारी बढ़ोतरी की है और अनुदानों को दो घटकों-सामान्‍य मौलिक अनुदान तथा सामान्‍य कार्यनिष्‍पादन अनुमान के रूप में विभाजित किया गया है। पहला अनुदान सभी स्‍थानीय निकायों तथा दूसरा अनुदान केवल उनके द्वारा पहुंचा जा सकता है जो संपत्‍ति कर बोर्ड, स्‍थानीय निकाय लोकपाल की स्‍थापना, राज्‍य वित्‍त आयोगों का सुदृढ़ीकरण, लेखा तथा लेखापरीक्षा सुधार, बेंचमार्किंग के जरिए सेवा के स्‍तर में सुधार आदि संबंधी आयोग द्वारा निर्धारित शर्तों का पालन करते हों। लेखकों ने राज्‍य तथा स्‍थानीय स्‍तरों पर सिफारिशों के अनुपालन को सुनिश्‍चित करने, स्‍थानीय निकायों की स्‍वायत्‍तता, सेवा डिलीवरी को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्‍त निधीयन की कमी, क्षमता निर्माण जरूरतें आदि जैसी सिफारिशों के प्रचालन संबंधी कुछ महत्‍वपूर्ण पहलुओं की जांच की। वे मानते हैं कि भावी केंद्रीय वित्‍त आयोग तथा राज्‍य वित्‍त आयोग दोनों ही 13वें वित्‍त आयोग की सिफारिशों से सबक लेंगे तथा अनुदानों को उन्‍नत शहरी शासन से जोड़ेंगे। लेखक इस बात की विवेचना करते हैं कि सुझाए गए शर्त/सुधार शहरी शासन ढांचे को सुदृढ़ करेंगे तथा शहरी सुशासन की ओर ले जाएंगे।

डी. रविन्द्र प्रसाद और वी. श्रीनिवास चारी
शहरी भारतः मुद्दे और चुनौतियां

21वीं शताब्‍दी में भारत में शहरीकरण की चुनौती अनोखी है। शहरी आबादी में विगत वर्षों में तेजी से वृद्धि हुई है और इस जनसंख्‍या वृद्धि का प्रभाव भारत के हर आकार के अधिकतर शहरों तथा शहरी आवासों में व्‍यापक रूप से प्रतिकूल है। इसमें आवास तथा जलापूर्ति में भारी कमी, अपर्याप्‍त जल निकासी, यातायात संबंधी भीड़भाड़, प्रदूषण, गरीबी तथा सामाजिक उथल-पुथल मिलाजुला है तथा इस प्रकार ये शहरी शासन को कठिन और दुष्‍कर कार्य बना रहे हैं। एक ओर जहां भारत में 'शहरी विस्‍फोट' योजनाकारों तथा शहरी मामलों के प्रबंधन से जुड़े संस्‍थान के लिए चिंता का कारण है, वहीं शहर व्‍यापक लचीलापन तथा विकास की संभावनाओं के साथ ‘विकास के नए इंजनों’ के रूप में उभरकर सामने आए हैं। संक्रांति को समावेशी, सुसंगत तथा सतत शहरी विकास के मार्ग पर ले जाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। तथापि छोटे बड़े सभी भारतीय शहर सुधार, सुशासन, नियोजन, शहरी निकायों का प्रबंधन तथा क्षमता निर्माण से संबंधी गंभीर मुद्दों तथा व्‍यापक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह शोधपत्र भारत में शहरीकरण के प्रमुख मुद्दों तथा चुनौतियों का व्‍यापक अध्‍ययन करता है तथा इस बात की विवेचना करता है कि शहरी विकास को अग्रसक्रिय सुधारों तथा उपयुक्‍त नीतिगत निर्देशों के साथ शहरों की व्‍यापक क्षमता को स्‍वीकारने की जरूरत है।

अनिल राय
शहरी भारतः सुधार के मार्ग पर अग्रसर

जेएनएनयूआरएम के तहत सुधार एजेंडा नगरपालिका तंत्र के सुधार तथा उन्‍हें देश के विकास की मुख्‍यधारा में लाने के लिए सरकार द्वारा विगत दो वर्षों में की गई पहलकदमियों की पराकाष्‍ठा है। इसने राज्‍य सरकारें तथा स्‍थानीय शहरी निकायों के लिए सतत आधार पर शहरी अवसंरचना संवर्धन तथा उन्‍नयन कार्यक्रमों को प्रारंभ करने के लिए सुधार एजेंडा क्रियान्‍वित करके केंद्रीय सहायता प्राप्‍त करने के लिए राज्‍य सरकारों तथा स्‍थानीय शहरी निकायों के लिए इसने अवसरों के अद्वितीय द्वार खोले हैं। तथापि प्रयास की यह मांग है कि भारत सरकार, राज्य सरकार तथा नगर प्रशासन सुधार एजेंडा के क्रियान्वयन के लिए साथ मिलकर निष्‍ठापूर्वक कार्य करें तथा इसके लिए अवसंरचना तथा सेवाओं सहित सक्षम सहायता प्रणाली प्रदान करने की जरूरत है जो शहरों तथा नगरों को उनकी पूर्ण क्षमता के दोहन में सहायता देगा। यह शोधपत्र सुधार एजेंडा के क्रियान्‍वयन से जुड़े राज्‍य सरकारों तथा मिशन शहरों के निष्‍पादन एवं प्रगति से जुड़ा परिस्‍थितिजन्‍य विश्‍लेषण प्रस्‍तुत करता है। जेएनएनयूआरएम के तहत धीमे निष्‍पादन वाले शहर/राज्‍य तथा प्रचालनगत चुनौतियां तथा मौजूदा मुद्दों के हैंडहोल्‍डिंग के लिए भारत सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्‍न कदम भी इस लेख में प्रस्‍तुत किए गए हैं।

उर्मिला बग्गा
भारतीय शहरों को झुग्‍गी मुक्‍त बनाने की ओर

केंद्र सरकार आगामी सात वर्षों में भारतीय शहरों को झुग्‍गी मुक्‍त बनाने के लिए एक करोड़ रुपए की महत्‍वाकांक्षी योजना तैयार कर रही है। राजीव आवास योजना नामक यह योजना वित्‍त की दृष्‍टि से ही नहीं बल्‍कि इससे भी अधिक नई सोच, नए विचार एवं नवीन संसाधनों की दृष्‍टि से बड़ी चुनौती दे रहा है। कार्यक्रम की सफलता पारंपरिक संकल्‍पनाओं तथा भूमिकाओं को त्‍यागने तथा भूमि एवं समुदाय का मुख्य संसाधन के रूप में उपयोग करके एक नई व्‍यापक तथा साझेदारी वाले दृष्‍टिकोण को विकसित करने पर निर्भर करता है। भूमि, आश्रय तथा अवसंरचना सेवा तक समावेशी तथा उचित पहुंच को ‘रिजर्वेशन’ तथा ‘सोशल सिटी रेस्‍पांसिबिलिटी’ की संकल्‍पनाओं के द्वारा प्राप्‍त किए जाने की जरूरत है। 'सार्वजनिक प्रयोजन', 'उचित आश्रय,' 'टेन्यर', 'भूमि उपयोग' एवं 'राजसहायता' को पुनः परिभाषित करना भी आवश्यक है। शहरों को अपनी उत्पादकता बढ़ाने, रोजगार सृजित करने तथा भूमि एवं अन्य संसाधनों के सर्वश्रेष्ठ उपयोग के लिए अपने योजनान्वयन प्रतिमानों को बदलना होगा। सतत, स्‍मार्ट तथा सुगठित विकास के लिए विशेषक सघनताओं तथा विकास नियंत्रक मानकों को अपनाने की जरूरत है। झुग्‍गी वाले आवास तथा सामूहिक सामुदायिक पुनर्वास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्‍साहित किया जाना चाहिए, जहां सार्वजनिक क्षेत्र के झुग्‍गी आवास कार्यक्रमों में भाग लेने की सामूहिक भागीदारी की बजाय सरकारी प्राधिकारी स्‍वयं को सामुदायिक पहलों में भाग लेने के लिए तैयार करे।

ए.के. जैन
शहरी उष्‍ण द्वीप में जीआईएस का उपयोगः जलवायु परिवर्तन संघर्ष करते मानवजनित कारक

शहरीकरण तथा आर्थिक निर्भरता जैसे मानवजनित कारक शहरी परिदृश्‍यों को गढ़ने में महत्‍वपूर्ण कारक रहे हैं। मानव का इतिहास लंबा तथा कई कदमों से भरा है जिसके द्वारा उसने परिस्‍थितिकीय प्रमुखता प्राप्‍त कर ली है। शहरी क्षेत्र इसका कोई अपवाद नहीं है, क्‍योंकि शहरों में सड़कें, भवन, उद्योग तथा लोगों के जुड़ने से शहर का तापमान उनके ग्रामीण परिवेशों में अपेक्षाकृत बढ़ता है और इस प्रकार उष्‍ण द्वीप का निर्माण होता है। ये शहरी उष्‍ण द्वीप इष्‍टतम परिस्‍थितियों में 7-12 डिग्री फारेनहाइट तक गर्म रहते हैं। बढ़ती शहरी उष्‍णता के साथ उष्‍ण द्वीप की बारंबारता तथा आकार में वृद्धि हो सकती है। उदाहरण के लिए दिल्‍ली, मुंबई और कोलकाता विगत 60 वर्षों में प्रति दशक अपेक्षाकृत लगभग 1 डिग्री फारेनहाइट से अधिक गर्म हो रहे हैं। ये उष्‍ण द्वीपों के कुप्रभाव हैं जो स्‍थानीय से वैश्‍विक स्‍तर के हो सकते हैं तथा पर्यावरण परिवर्तन की तुलना में शहरीकरण के महत्‍व को रेखांकित कर सकते हैं। ये पर्यावरण संकट के सभी लक्षणों से हम पहले से प्रभावित हैं। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसके बारे में दूर की किसी भावी संभावना की तरह नहीं बल्‍कि समकालीन वास्‍तविकता के रूप में चिंता करने की जरूरत है। यह ग्रामीण एवं मौलिक सौंदर्य के विलुप्‍त होने का शोकगीत नहीं बल्‍कि जीवित रहने के लिए प्रत्‍यक्ष रूदन है। यह शोधपत्र विभिन्‍न प्रकार के भूमि उपयोग, 29 वर्षों (1980-2009) की अवधि में उनके विभिन्‍न परिवर्तनों का पता लगाने तथा शहरी विस्‍तार की दर तथा अध्ययन क्षेत्र में वनस्‍पतियों की क्षति की दर आकलन करने के लिए दूर संवेदी तथा जीआईएस तकनीकियों के उपयोग का विश्‍लेषण करता है।

स्वर्णिम सिंह
शहरी-ग्रामीण अंतर को पाटनाः बाधाएं एवं अवसर

यह अध्‍ययन भारत में ग्रामीण-शहरी संबंधों कर समझ और ज्ञान संबंधी अंतर को विकसित करने, दो स्‍थानिक क्षेत्रों को पाटने में व्‍याप्‍त चुनौतियों तथा अवसरों से जुड़े व्‍यापक अनुसंधान का हिस्‍सा है। विकास, नीति तथा प्रैक्‍टिसों से जुड़े कई प्रमुख मुद्दे हैं। तथापि अध्‍ययन में संस्‍थागत क्षमताओं, स्‍थानिक आयामों तथा आर्थिक अंतरनिर्भरताओं के मुद्दों को गहरे अध्‍ययन के लिए तथा राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय दोनों स्‍तरों से अनुभवों के साथ विश्‍लेषण प्रारंभ किए गए हैं।

इस शोधपत्र का भाग 1 शहरी तथा ग्रामीण इलाकों के बीच संस्‍थागत, स्थानिक तथा आर्थिक लिंकेजों पर कुछ पृष्‍ठभूमि संबंधी सूचना प्रदान करता है। भाग 2 उपरोक्‍त तीन आयामों से संबंधित इस क्षेत्र में मौजूद बाधाओं एवं अवसरों पर विमर्श करता है। भाग 3 अच्‍छे प्रैक्‍टिसों को रेखांकित करता है जो मौजूद बाधाओं एवं अवसरों पर विचार करते हुए तीन आयामों के समाधान के रूप में कार्य करता है जिसका आगे अध्‍ययन किया गया है तथा प्रतिबिंबित किया गया है।

नीलांजना दासगुप्ता सुर
अभ्‍यंतर परिधि को निगल जाता है: चंडीगढ़ परिधि क्षेत्र का अध्‍ययन

यह पत्र 1962 में संशोधित चंडीगढ़ पेरिफेरी कंट्रोल अधिनियम 1952 की संभावना की पड़ताल करता है जिसका उद्देश्‍य शहर के परियोजना स्‍थल से 16 किलोमीटर तक व्‍यापक ग्रामीण विशिष्‍टता को बनाए रखना था। इसका ध्‍येय चंडीगढ़ शहर को हरित आवरण प्रदान करना तथा इसे शहरी विस्‍तार के असुरक्षित स्‍वरूप से सुरक्षा प्रदान करना था। यह विश्‍लेषण सरकारी दस्‍तावेजों तथा संबंधित साहित्‍य, वर्ष 1951-2001 के लिए द्वितीयक आंकड़े, व्‍यापक फील्‍ड ऑब्‍जर्वेशन, तथा पणधारियों के साथ विमर्श पर आधारित है। परिधि क्षेत्र के लक्षित ग्रामीण चरित्र को संरक्षित नहीं किया जा सकता है; यह धीरे-धीरे विस्‍तारित होकर आधुनिक शहर का अव्‍यवस्‍थित प्रसार बन गया है। 2001 तक यह क्षेत्र चिह्नित किए जाने के समय चार की तुलना में 12 शहर/नगर समूह के साथ बिंदु से रेखांकित किए गए थे; शहरी क्षेत्र में 1951-2001 के दौरान 10 से 140 वर्ग किमी. की तीव्र वृद्धि दर्ज की गई; और अब इस क्षेत्र की अधिकतर आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। यह अब एक अनिवर्त्‍य प्रक्रिया है। मौजूदा लोकलुभावन राजनीतिक संस्‍कृति तथा उदासीन नौकरशाही वाले वातावरण में इस अधिनियम के प्रावधानों का न केवल लोगों द्वारा बल्‍कि स्‍वयं सरकार द्वारा घोर उल्‍लंघन किया गया है। उभरते परिदृश्‍य में चंडीगढ़, एसएएस नगर तथा पंचकुला के विस्‍तारित शहरी आबादी के चारों और नए परिरेखा क्षेत्र में झांकना उचित होगा। वर्तमान परिरेखा शहरीकरण की प्रक्रिया के स्‍थानिक प्रसार के माध्‍यम से पहले ही कोर का हिस्‍सा बन चुकी है।

पवन कुमार शर्मा
मामले का अध्‍ययनः शिमला (हिमाचल प्रदेश) को जलापूर्ति का पुनरावलोकन और संभावनाएं

तीव्र शहरीकरण से भौतिक अवसंरचना की मांग में अत्‍यधिक वृद्धि हुई है जो कस्‍बों और शहरों के बढ़ते आकार के अनुरूप नहीं बढ़ सकी, जिसके परिणामस्‍वरूप पहले से ही कम अवसंरचना पर दबाव बढ़ा है। यह सामान्‍य समझ है कि मनुष्‍य इस ग्रह के संसाधनों से आगे जीवन-यापन कर रहे हैं तथा वैश्विक प्रतिमान धारणीय नहीं हैं। यह स्थिति चेतावनी देने वाली महसूस होती है क्‍योंकि सामान्‍य सेवाएं न मिलने के साथ ही शहरी पर्यावरण के क्षय होने के फलस्‍वरूप सामाजिक तनाव और शहरी असुरक्षा बढ़ी है। इसलिए, शहरी अवसंरचना के प्रावधान भिन्‍न-भिन्‍न स्‍तरों पर सावधानी से लागू कि‍या जाना आवश्‍यक है। इस दस्‍तावेज में शिमला शहर में जलापूर्ति की उपलब्‍धता और पहुंच की समीक्षा और विश्‍लेषण किया गया है तथा वर्तमान जलापूर्ति की जटिल समस्‍याओं की पहचान की गई है एवं शिमला में जलापूर्ति में सुधार के लिए व्‍यवहार्य और स्‍वीकार्य हस्‍तक्षेपों का प्रस्‍ताव किया गया है।

हरि पाल सिंह, डॉ एम आर. शर्मा, डॉ कामुरल हसन, डॉ नावेद अहसान
Year: 
2010