शहरी भारत 2009 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 18 जनवरी 2016 - 11:31am
भारत के शहरी गरीबों के लिए जलापूर्ति - नया नीतिगत प्रतिमान

त्‍वरित शहरीकरण ने अपने प्रारंभ के साथ झुग्‍गी आबादी की व्‍यापकता आई। झुग्‍गी में रहने वालों को विशेषकर जल और स्‍वच्‍छता अतिनिम्‍नतम स्‍तर की सेवा डिलीवरी प्राप्‍त होती है। शहरी गरीबों को मूलभूत सेवाओं के प्रावधान पर कोई ठोस नीति के अभाव में नवीन चीजें आइसोलेटिड पायलट परियोजनाओं के स्‍तर पर रह गए हैं। गरीबों प्रायः को अपेक्षाकृत निम्न स्तरीय सेवाएं प्राप्त करने के लिए अपनी सुलभ गृहस्थी आय के अनुपात में कहीं अधिक धन खर्च करना पड़ता है। गरीबों के लिए मुफ्त पानी कल्पना है और संपूर्ण विकसित दुनिया में सफल नवाचार हुए हैं जो सर्वभौम पहुंच वाली सामाजिक व्‍यवस्‍था की विशेषताएं प्रदर्शित करता है जहां निर्धन लोग संवर्द्धित सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं। यह शोधपत्र सफल मामलों से नीतिगत सीख को रेखांकित करता है और शहरी भारत में गरीब समुदायों को जलापूर्ति प्रदान करने के लिए नए नीतिगत प्रतिमान का मामला तैयार करता है।

शिप्रा सक्सेना
भारत में क्रियान्‍वित त्‍वरित शहरी जलापूर्ति स्‍कीमों का आकलन

शहरीकरण तथा औद्योगिकरण के कारण हमारे पास प्रदूषित नदियां, संदूषित मृदा, क्षीण वन्‍य जीवन और बची-खुची प्राकृतिक संसाधन रह गए हैं। जनसंख्‍या में वृद्धि ने हमारे तकनीकीविदों तथा जल प्रबंधकों को विविध उपयोगों के लिए जल की मांग की पूर्ति के लिए तकनीकी दृष्‍टि से व्‍यवहार्य विकल्‍पों को तालाशने पर विवश कर दिया है। त्‍वरित शहरी जलापूर्ति कार्यक्रम (एयूडब्‍ल्‍यूएसपी) शहरी विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्‍ली द्वारा तैयार किया जाता है। यह स्‍कीम विशेषकर उन शहरों के लिए बनाई गई थी जिनकी आबादी 20,000 से कम है, जिन्‍हें प्रायः उपेक्षित रखा जाता है और सूखे के दिनों में ये सबसे अधिक बुरी हालत में होते हैं। टैरिफ को युक्‍तसंगत बनाने, जलापूर्ति तथा स्‍वच्‍छता के लिए बजट को नगरपालिका बजट से अलग करने, सुचिह्नित लक्षित समूह के लिए राजसहायता और जल संरक्षण सहित जलापूर्ति में सामुदायिक भागीदारी के लक्ष्‍य के साथ इन स्‍कीमों को क्रियान्‍वित किया जाता है। इस क्षेत्र में अपेक्षाकृत व्‍यापक निजी क्षेत्र की अधिक साझेदारी और निवेश के प्रयास किए गए थे। यह पत्र क्रियान्‍वयन में यूजर एजेंसी की भूमिका, प्रचालन और अनुरक्षण (ओएंडएम), क्रियान्‍वयन के दौरान वित्‍तीय साझेदारी, ओएंडएम लागत में स्‍वावलंबन, जलापूर्ति की मात्रा व गुणवत्‍ता के संबंध में स्‍थिति का पता लगाने के लिए नेशनल इंवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्‍टीच्‍यूट (एनईईआरआई) द्वारा किए गए मामला अध्‍ययन का खुलासा करता है। यह पाया गया था कि सार्वजनिक साझेदारी स्‍थानीय निकायों द्वारा दिए गए 5 प्रतिशत वित्‍तीय अंशदान के रूप मात्र में थी। क्रियान्‍वयन प्रारंभ करने तथा प्रचालन तथा अनुरक्षण के किसी स्‍तर पर एनजीओ और निजी संगठनों की संलग्‍नता नहीं पाई गई थी।

कीर्ति वाई. लांजेवार, श्वेता डी. वैद्य, विजया ए. जोशी व सुभाष पी. आंदे
वर्षा जल का संचयः एक महान उद्देश्‍य- साझा जिम्‍मेदारी

जल की कमी की समस्‍याओं तथा इसके परिणामस्‍वरूप शहर तथा समुदयों द्वारा झेली जा रही कठिनाइयों के प्रति प्रचंड प्रतिक्रिया के रूप में भारत ने वर्षा जल के संचय के लिए व्‍यापक निवेश किया है। व्‍यापक जल स्रोत तंत्रों के विपरीत इन प्रयासों में मोटे तौर पर जलीय नियोजन तथा मजबूत आर्थिक विश्‍लेषण की कमी है। भारत में स्‍थानीय जल संचयन/भूजल रिचार्ज क्रियाकलाप के प्रभाव पर अनुसंधान नगण्‍य हैं। वर्षा जल संचयन दुनिया भर में प्रकारों के नवजागरण के दौर से गुजर रहा है, लेकिन यह बाईबिल के युग जितना प्राचीन है। वर्षा जल के व्‍यापक संचयन वाला उपकरण 4000 वर्ष पूर्व फिलिस्‍तीन और यूनान में मौजूद थे। प्राचीन इटली में शहर के कृत्रिम जलसेतु से जल को संवर्द्धन के लिए वर्षा जल संचय के लिए भवन में व्‍यक्‍तिगत कुंड बने थे तथा आंगन खरंजायुक्‍त बनाए जाते थे। तीसरी सदी ई.पू. में बलूचिस्‍तान तथा कच्‍छ के किसान वर्ग के लोग वर्षा जल एकत्र किया करते थे तथा सिंचाई वाले बांधों में इसका उपयोग किया करते थे। यह शोधपत्र भारत के जल की कमी वाले क्षेत्रों में वर्षा जल संचय के महत्‍वपूर्ण मुद्दे की पहचान करता है। इसमें नेशनल वाटर हार्वेस्‍टर्स नेटवर्क (एनडब्‍ल्‍यूएचएन) के उद्देश्‍यों व लक्ष्‍यों की भी चर्चा की गई है तथा वर्षाजल संचय, इसकी जरूरत, व्‍यवहारिक क्रियान्‍वयन तथा लाभों के प्रति जागरूकता पर जोर देता है।

नेहा वालिया
समुदाय - नेतृत्व में स्वच्छता कार्यक्रम, सांगली, महाराष्ट्र

महाराष्‍ट्र के सांगली में समुदाय आधारित स्‍वच्‍छता कार्यक्रम में इस शहर में बारह झुग्‍गियों के 3,500 घरों की सहायता की जा रही है ताकि उन्‍हें पर्याप्‍त स्‍वच्‍छता सुविधाओं तक पहुंच प्रदान किया जा सके। यह पहल स्‍थानीय सरकार (सांगली मिराज कुपवाड नगर निगम); अंतर्राष्‍ट्रीय एजेंसियों (यूएसएआईडी, इंडो-यूएस फायर-डी, सीटीज एलायंस); एक गैर-सरकारी संगठन (सेल्‍टर एसोसिएट्स) एवं समुदाय आधारित संगठन (बंदनी) के बीच साझेदारी से की गई है। सांगली का अनुभव यह बताता है कि किस प्रकार स्‍थानिक मैपिंग, सामाजिक सर्वेक्षण और जीआईएस का उपयोग समुदाय स्‍वच्‍छता प्राथमिकताओं को सुनिश्‍चित करने तथा व्‍यवहार्य तकनीकी डिजाइन विकसित करने के लिए किया जा सकता है। यह मॉडल शहरी गरीब की स्‍वच्‍छता समस्‍याओं के समाधान के रूप में शौचालय पर बल देते हैं तथा कारगर समुदाय आधारित शौचालय प्रबंधन ढांचे को भी प्रदर्शित करता है। यह कार्यक्रम अवसंरचना विकास में अपने स्‍वयं के संसाधनों को लगाने के लिए आवासों को सुकर बनाने के साथ-साथ दाता, सार्वजनिक व निजी वित्‍तपोषण का कारगर ढंग से उपयोग करता है। पर्याप्‍त स्‍वच्‍छता सुविधाओं के प्रावधान नगरव्‍यापी झुग्‍गी उन्‍नयन में प्रभावकारी प्रवेश द्वारा साबित हुए हैं।

प्रतिमा जोशी, चेतन वैद्य व शिखा शुक्ला
यूथोपिया के द्वितीयक शहरों में सार्वजनिक ठोस कचरा प्रबंधन के लिए नवीन वित्‍तपोषण तंत्र- अरबा मिंच शहर का मामला

ठोस कचरा प्रबंधन कई विकासशील देशों के शहरी इलाकों में सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य तथा पर्यावरणीय चिंता का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। शहरी यूथोपिया में यह समस्या विशेषकर काफी गंभीर है। सार्वजनिक क्षेत्र सेवा डिलीवरी में अक्षम है, निजी क्षेत्र के विनियामक सीमित हैं तथा घरेलू और औद्योगिक कचरों को अवैध ढंग से फेंकना आम बात है। सामान्‍यतया ठोस कचरा प्रबंधन को प्राथमिकता न के बराबर दी जाती है। इसके परिणामस्‍वरूप स्‍थानीय प्राधिकरणों द्वारा ठोस कचरा प्रबंधन क्षेत्र को बहुत सीमित निधियां प्रदान की जाती है, और सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए आवश्‍यक सेवाओं के स्‍तर प्राप्‍त नहीं किए जाते हैं। शहरी क्षेत्रों में पर्याप्‍त ठोस कचरा प्रबंधन सुविधाओं का प्रावधान प्रमुख निवेश है जो शहरों, नगरों तथा नगरपालिकाओं में रहने वाले लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य की रक्षा और कल्‍याण तथा पर्यावरण का संरक्षण करता है। इस प्रकार अरबा मिंच की नगरपालिका को अध्‍ययन के मामले के रूप में लेकर यूथोपिया के तेजी से विकास कर रहे द्वितीयक शहरों में सार्वजनिक ठोस कचरा प्रबंधन के लिए नवाचारी निधीयन तंत्रों का पता लगाना इस अध्‍ययन का उद्देश्‍य है। इसका निष्‍कर्ष यह दर्शाता है कि अपर्याप्‍त वित्‍तीय क्षमता वित्‍त, एडमिनिस्‍टर तथा ठोस कचरा प्रबंधन सेवाओं के मॉनिटर निपटान करने में संस्‍थानों की अक्षमता है। यह मांग कचरा प्रबंधन तथा जल निकासी के प्रावधान, ठोस कचरा निपटान की क्षमता बढाने, संचरण तथा वितरण तंत्रों के वित्‍तपोषण के लिए संस्‍थागत विकल्‍पों की स्‍थापना के लिए आवश्‍यक हैं तथा इसके लिए मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस कचरा प्रबंधन के वित्‍तपोषण के लिए नए अवसरों को तलाशने की जरूरत है। इस प्रकार यह शोधपत्र इस बात की चर्चा करता है कि चूकि ठोस कचरा प्रबंधन के निधीयन के परंपरागत दृष्‍टिकोण कारगर नहीं हैं, इसलिए इस मामले में नए व नवाचारी दृष्‍टिकोण को अपनाए जाने की जरूरत है।

जोनाथन एनदेतो
बहुमॉडलीय परिवहन प्रणाली के लिए नीति उन्‍मुख दृष्‍टकोणः आगे की चुनौतियां

बहुमॉडलीय परिवहन प्रणाली के लिए केवल विभिन्‍न साधनों का एकीकरण ही आवश्‍यक नहीं है बल्‍कि इसके लिए उपयुक्‍त इंटरचेंज की सुविधाओं का सृजन, बस सेवाओं का पुनर्गठन, एकीकृत नियोजन, तीव्र परिवहन तंत्र आदि भी जरूरी है, ताकि वैश्‍विक परिवहन के सापेक्ष एक कदम आगे रहा जा सके। सैर और साइकिल के एकीकरण को भी अमोटरीकृत परिवहन को बढाने तथा व्‍यक्‍तिगत वाहनों का उपयोग घटाने के लिए सार्वजनिक परिवहन के साथ जोड़ा जा सकता है। शहरी परिवहन राज्‍य का विषय है तथा इसप्रकार पैदल यात्रियों की आवाजाही, गैरमोटरीकृत साधनों, एमआरटीएस, संस्‍थागत/विनियामक उपाय तथा अन्‍य क्षेत्रों जैसे शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, प्रॉपर्टी विकास आदि के साथ उपयुक्‍त एकीकरण के लिए नीति उन्‍मुख दृष्‍टकोण की आवश्‍यकता है। परिवहन के क्षेत्र में नीति को आवश्‍यक रूप से क्षेत्र आधारित साधनों द्वारा वर्गीकृत किया जाना चाहिए। इसके बावजूद उन्हें संपूर्ण यात्रा पर मूल स्‍थान से अंतिम गंतव्‍य तक केंद्रित होना चाहिए तथा इन्‍हें इस यात्रा की श्रृंखला तथा साधनों के कांबिनेशन के रूप में देखा जाना चाहिए। बहुमॉडलीय नीति के लिए परिवहन तंत्र के सभी व्‍यक्‍तिगत कारकों को समन्‍वित करने के लिए एक राजनीतिक तथा तकनीकी संगठन की आवश्‍यकता है।

पवन कुमार, एस.वाई. कुलकर्णी और एम. परिदा
मॉडल मुनिसिपल लॉ (एमएमएल): शहरी स्‍थानीय निकायों को सशक्‍त बनाने के लिए सक्षम बनाने वाला कानूनी वातावरण का सृजन

मॉडल मुनिसिपल लॉ (एमएमएल) को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम (सीएए) में कहे अनुसार भारत सरकार के पहलों को विकेंद्रीकरण के क्रियान्‍वयन को सुकर बनाने के लिए विकसित किया गया था तथा बाद में इसे जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्‍यूअल मिशन के तहत निर्धारित सुधार एजेंडे के द्वारा लागू किया गया था। इस कानून का लक्ष्‍य राज्‍य सरकारों को अपने नगरपालिका अधिनियमों को इस प्रकार संशोधित करने में सहायता देना है कि वे यूएलबी को सशक्‍त करने के लिए लक्षित सुधारों को संस्‍था का रूप दे सके तथा वे स्‍थानीय सरकार के संस्‍थानों के रूप में उन्‍हें कार्य करने में सक्षम बना सके। एमएमएल दस्‍तावेज में (क) नगरपालिका कानूनों के लिए नीतिगत विकल्‍प दस्‍तावेज; और (ख) नीतिगत विकल्‍पों के एक सेट के लिए कानून होता है। एमएमएल को विकसित करने की संपूर्ण प्रक्रिया शहरी विकास मंत्रालय तथा गरीबी उपशमन (एमओयूडीएंडपीए) द्वारा समर्थन प्रदान किया जाता है। यह संकल्‍पित किया जाता है कि एमएमएल भारत सरकार के शहरी सुधार एजेंडे को क्रियान्‍वित करने के लिए अनुकूल विधायी ढांचा प्रदान करेगा।

शिखा शुक्ला
शहरी स्‍थानीय निकायों में व्‍यवहारिक जल मूल्‍य निर्धारण प्रणाली की शुरूआत में समस्‍याएं: जबलपुर का मामला अध्‍ययन

इस मामला अध्‍ययन में दृढ इच्‍छाशक्‍ति के अभाव के कारण जबलपुर शहर में व्‍यवहारिक जल-मूल्‍यनिर्धारण प्रणाली की शुरूआत करने के असफल प्रयासों पर प्रकाश डालता है। इसमें दर्शाया गया है कि बिना मीटर की जलापूर्ति वाली स्‍थिति में जल प्रभार लाभों की राजसहायता का बड़ा लाभ दूसरों की अपेक्षा संपन्‍न उपभोक्‍ताओं को होता है क्‍योंकि प्रति कनेक्‍शन उतने ही तय मासिक प्रभार पर उनके पास अधिक भंडारण क्षमता उपलब्‍ध होने के कारण उनके पास अधिक जल उपलब्ध होता है। यह इस बात को दर्शाता है कि चुने गए निकायों में प्रभार बढाने की इच्‍छाशक्‍ति की कमी है क्‍योंकि उन्‍हें इस बात का डर सताता है कि उनके इस निर्णय से उनके वोट बैंक पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। तथापि आम लोग बढ़े प्रभार के वहन के लिए इच्‍छुक हैं बशर्ते उन्‍हें उचित सेवाएं प्रदान की जाएं तथा वर्द्धित जल प्रभार के कारणों के बारे में उन्‍हें विस्‍तार से बताया जाए।

अनिरुद्धे मुखर्जी
Year: 
2009