शहरी भारत 2007 | जनवरी-जून

Submitted by niuaadmin on 18 जनवरी 2016 - 1:05pm
भारत में शहरी विकेंद्रीकरणः मुद्दे एवं आगे की राह

संविधान का 74वां संशोधन भारत के स्‍थानीय शहरी निकायों को सशक्‍त बनाने तथा शहरी विकेंद्रीकरण को समर्थन देने के लिए किया गया था। तथापि विगत 15 वर्षों में विभिन्‍न राज्‍यों में विकेंद्रीकरण के क्रियान्‍वयन का स्‍वरूप भिन्‍न-भिन्‍न है। इस शोधपत्र में शहरी विकेंद्रीकरण से जुड़े कई मुद्दों जैसे लचर स्‍टाफ क्षमता, सेवा की डिलीवरी में पैरास्‍टॉलस की भूमिका, नगरपालिकाओं के पास राजस्‍व का अपर्याप्‍त आधार, यूएलबी को केंद्र व राज्‍य सरकारों की ओर से सीमित तथा तदर्थ हस्‍तांतरण आदि की पहचान की गई है। यह पत्र इस संदर्भ में सुझाव देता है कि मुख्‍य एवं अन्‍य कार्यों में वर्गीकरण के लिए संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए तथा औद्योगिक क्षेत्रों को यूएलबी के सृजन से छूट नहीं दी जानी चाहिए तथा केंद्रीय वित्‍त आयोगों को कतिपय केंद्रीय करों से जुड़े यूएलबी को सहायता-अनुदान प्रदान किया जाना चाहिए। पत्र यह भी सलाह देता है कि कई यूएलबी के साझा वर्गीकरण को अपनाना, नगरपालिका स्‍टाफिंग का न्‍यूनतम स्‍तर, मेयरों के लिए अनन्‍य शक्‍तियां, यूनिट क्षेत्र पद्धतियां या संपत्‍ति कर आकलन का पूंजीगत मूल्‍य पद्धति, महानगरी तथा जिला नियोजन समितियों के लिए अपेक्षाकृत बड़ी भूमिका, जलापूर्ति और सीवेज प्रणाली का प्रबंधन करने जैसे प्रशासनिक उपाय यूएलबी के मुख्‍य कार्य होने चाहिए जिससे सेवाओं की डिलीवरी तथा बेहतर लागत उगाही तथा शहरी सेवाओं के लिए विनियामक ढांचा स्‍थापित करने में निजी क्षेत्र की भागीदारी के प्रावधानों को सक्षम किया जा सके।

प्रो चेतन वैद्य
शहरी जोखिमों का निर्धन-अनुकूल शासनः अहमदाबाद का मामला

यह शोधपत्र अहमदाबाद में जोखिम न्‍यूनीकरण तथा रोकथाम को मुख्‍यधारा में लाने के लिए चालू सरकार में संरचनात्‍मक कमी तथा क्षमताओं की पड़ताल करता है। अहमदाबाद में शहरी संवेदनशीलता तथा जोखिमों के बहुआयामी कारकों तथा भूगोल का विस्‍तार से विश्‍लेषण करने के क्रम में यह तर्क दिया जाता है कि शहरी जोखिम में आयामों की बहुलता है जो पारंपरिक जोखिम प्रबंधन के दृष्‍टिकोण से कहीं इतर है, लेकिन यह शहरी विकास तथा निर्धनता न्‍यूनीकरण को प्रभावित करता है। जोखिमों के इस नजरिए को ‘जोखिम प्रबंधन’ की बजाय ‘शहरी जोखिम शासन’ की शब्‍दावली में प्रतिबिंबित किया जाता है। जोखिम शासन एक निर्धन-अनुकूल तथा बहु-पणधारी दृष्‍टिकोण की मांग करता है जो विभिन्‍न रायों की अभिव्‍यक्‍ति की अनुमति देता है। ऐसा नीतिगत ढांचा शहरी जोखिमों की जटिलता से निपटने के लिए उनके दृष्‍टिकोण तथा शासन के तरीके में परिवर्तन के लिए शहरी शासनों की क्षमता को आवश्‍यक बनाता है। अब तक न राज्‍य और न ही अहमदाबाद नगरपालिका प्राधिकरण नगर स्‍तर पर व्‍यापक जोखिम प्रबंधन ढांचा स्‍थापित करने की जरूरत को महत्‍व देता प्रतीत होता है, हाल का सीटी डेवलपमेंट प्‍लान पहली बार शहरी जोखिम प्रबंधन को हल करने पर बल देता है। इस प्रकार इस आयाम को शहरी नियोजन पर विचार करने योग्‍य विंदुओं में शामिल करने का अवसर हो सकता है।

डॉ क्रिस्टोफ वोइवोडे
सतह पर शहरीकरण तथा आरएस जीआईएस प्रौद्योगिकियों का उपयोग का प्रभाव विश्‍लेषण: पुणे नगर निगम का मामला अध्‍ययन

भूमि तथा जल से संबंधित कृत्रिम सुधार दुनिया के खोये शहरों के सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ-साथ आमतौर पर भू-पर्यावरण तथा विशेषकर भूमिगत जल क्षेत्रों पर गंभीर खतरा उत्‍पन्‍न कर रहा है। यह समस्‍या अविकसित तथा विकासशील देशों में खतरनाक स्‍तर तक पहुंच चुका है। समस्‍याओं की पहचान करने, उनके प्रभाव आकलन तथा स्‍थान विशिष्‍ट समाधान प्रदान करने में दूर संवेदी तथा भौगोलिक सूचना प्रणाली (आरएस-जीआईएस) का उपयोग एक समाधान है।

इस बात को ध्‍यान में रखते हुए रूपरेखाओं के विषयक परतों, जल निकासी, भूगर्भविज्ञान तथा भूमि उपयोग/भूमि कवर को आईएलडब्‍ल्‍यूआईएस सॉफ्टवेअर तैयार किए गए थे। इन विषयक परतों की अध्‍यारोपित तस्‍वीर प्राप्‍त कर ली गई थी तथा इसकी व्‍याख्‍या की गई थी। रूपरेखा के आवरण तथा भूमि उपयोग/भूमि कवर से पता चला कि 44% क्षेत्र, 10% क्षेत्र और 2% क्षेत्र क्रमशः 600 एम उन्‍नतांश से कम, 660 तथा 720 एम उन्‍नतांश तथा 720 एम से अधिक उन्‍नतांश वाले क्षेत्र प्रवेश्‍य भूमि सतह को अप्रवेश्‍य भूमि सतह में बदल कर परिवर्तित हो चुका है। 147 प्रथम ऑर्डर स्‍ट्रीम तथा 37 द्वितीय आर्डर स्‍ट्रीम में से क्रमश: 57 तथा 23 स्‍ट्रीम (कुल लंबाई 65 किमी.) निर्माण प्रयोजनों जैसे भवन तथा परिवहन मार्गों के लिए भूमि को बराबर करने की प्रक्रिया में गायब हो गए। ये सभी बदलाव अचानक आनेवाली बाढ तथा भूजल भंडारण क्षमता के न्‍यूनीकरण के कारण हुए हैं।

वर्ष 1986 और 2006 के तुलनात्‍मक सूचीबद्ध आंकड़ों से पता चलता है कि यद्यपि रामनदी के साथ खुदे कुंओं में भूजल का स्‍तर बरसात के मौसम में सतह तक पहुंच जाता है, लेकिन विगत सतह के गिरावट से यह तेजी से नीचे गिरता है और इसप्रकार भंडारण क्षमता में कमी आती है। पीएमसी सीमा के बाहर स्‍थित रामनदी के सतही जल के नमूने ताजे हैं, जो शहरीकृत क्षेत्र में प्रवेश करने के साथ ही विकृत हो जाते हैं। इस जल में गंदलापन, बीओडी, सीओडी, खारापन तथा कसैलापन मौजूद है जो इस बात का संकेत है कि रामनदी के निम्‍न प्रवाह में प्रदूषण बढ रहा है।

डॉ भावना उमरीकार और उमा अय्यर
समावेशी शहरों के लिए आवास

यह शोधपत्र भारतीय अनुभव के व्‍यापक संदर्भ में समावेशी शहरों के विकास के लिए आवास की भूमिका प्रस्‍तुत करता है। यह देखा गया है कि ‘हाउजिंग’ को चार दीवारों और एक छत के रूप में नहीं, बल्‍कि इसे आवास के व्‍यापक भाव तथा मानव बस्तियों के सतत विकास के रूप में देखा जाना चाहिए। साथ ही समावेशी शहर गरीबी उन्‍मूलन, सुरक्षित वातावरण, उत्‍पादकता तथा जीवन गुणवत्‍ता संबंधी राष्‍ट्रीय नीतिगत लक्ष्‍यों को प्राप्‍त करने के साझा उद्देश्‍य के रूप में उभर कर सामने आया है। इस प्रकार ‘हाउजिंग’ कवरिंग आश्रय, संबंधित सेवाओं तथा जीवनयापन अवसरों की पर्याप्‍तता ‘समावेशी’ शहरों के लिए पूर्वापेक्षा बन गई है। यह तर्क दिया जाता है कि ‘हाउजिंग एक्‍सक्‍लूशन’ के वर्गीकरण को वैश्‍विक स्‍तर पर सुलझाने की जरूरत है और यह पत्र यह सुझाता है कि ‘हाउजिंग इनक्‍लूशन’ के लिए उपयुक्‍त रणनीति बनाने के लिए आवश्‍यक ‘कार्रवाई’ जरूरी है।

डॉ के.के. पांडे
संस्कृति और प्रवासनः दिल्ली की एक झुग्गी बस्ती से कुछ विचार

भारत जैसे विविधता वाले देशों में महानगरीय झुग्‍गियां हमेशा ही विभिन्‍न भाषा-भाषी, धर्म तथा क्षेत्रीय पृष्‍ठभूमि वाले ग्रामीण प्रवासियों के घर रहे हैं तथा यह अनोखी संस्‍कृति की गतिशीलता को प्रतिबिंबित करता है। किस प्रकार ‘देस’ का सांस्‍कृतिक रीति-रिवाज या निर्धन प्रवासियों का मूल स्‍थान अभी भी प्रवसन के बाद उनके सपनों तथा विश्‍वदृष्‍टि की सूचना देता है तथा किस सीमा तक महानगरीय झुग्‍गी अपने स्‍वयं का सामासिक लेकिन भिन्न सांस्‍कृतिक लोकाचार उत्‍पन्‍न करने में सक्षम है?’ यह एक प्रश्‍न है जो अपने अनुभवसिद्ध मूल्‍यों तथा उत्‍तर आधुनिक विश्‍व में ‘संस्‍कृति’ की पुनर्संकल्‍पना की चुनौती से निपटने दोनों ही के लिए पड़ताल का विषय है।

यह शोधपत्र कुछ जीवन इतिहासों में मूल्‍यों, विश्‍वासों तथा गोचर पहचानों की बदलती पद्धतियों के संबंध में मेरे निष्‍कर्ष की संक्षिप्‍त रिपोर्ट तथा पूर्वी दिल्‍ली में सीमापुरी के निकट अर्धकनगर तथा उत्‍तरप्रदेश के मेरठ जिले के धनतला गांव के झुग्‍गी समूहों के निवासियों के साथ लगभग दो दर्जन लंबे अर्द्ध-संरचित इंटरव्‍यू के माध्‍यम से इन कुछ मुद्दों को हल करने का प्रयास करता है।

डॉ देवेश विजय
शहरी क्षेत्रों में नए कार्यों, क्रियाकलापों तथा बदलते शहरी स्‍वरूपों के विकास में आईसीटी की भूमिका

सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों (आईसीटी) ने आधुनिक व्‍यापार के तरीकों/प्रक्रियाओं में क्रांति ला दी है, जिसके परिणामस्‍वरूप व्‍यापार यूनिटों (फर्म/कंपनी/ निगम/ उद्योग/ थोक/ खुदरा विक्रेता) ने उन्‍हें तेजी से अपनाया है। भूमंडलीकरण के व्‍यापक संदर्भ के भीतर व्‍यापार यूनिटों में आईसीटी के उदय को शहरों में नई क्रियाकलापों (टेलीवर्किंग, ऑफशोरिंग...24/7 कार्य), कार्य (टेक्‍नोपार्क, गेटिड एनक्‍लेवों....एराट्रोपॉलिस) तथा बदलते शहरी स्‍वरूपों (एकल केंद्रित) के साथ जोड़ा जाता है। यह शोधपत्र साहित्‍य की समीक्षा के माध्‍यम से इस संबंध को रेखांकित करने का प्रयास करता है।

डॉ डी. विजय किशोर और भानु एम. मारवाह
भारत में सतत शहरी विकासः कुछ मुद्दे, कुछ विकल्प

यह पत्र विशेषकर भारत के संदर्भ में सतत शहरी विकास तथा शहर के स्‍वरूप से संबंधित कुछ मुद्दों पर चर्चा करता है। यह पत्र सबसे पहले सतत शहरी विकास की अवधारणा की व्‍याख्‍या करता है। इसके बाद इसमें भारत में शहरों की मूलभूत सेवाओं की कमियों तथा पर्यावरण अनुकूल तरीके से सेवाओं को कैसे प्रबंधित किया जाए तथा इसे और अधिक लाभकारी बनाया जाए इस पर चर्चा की गई है। इसके बाद इस पत्र में शहर के दो स्‍वरूपों तथा भारतीय शहरों में इनकी संभावनाओं की चर्चा की गई है। शहर के जिन दो स्‍वरूपों की चर्चा की गई है वे हैं संघटित शहरी स्‍वरूप तथा बहु-मॉडलीय शहरी क्षेत्र।

डॉ बसुधा चट्टोपाध्याय
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Year: 
2007