कोलकाता की मलिन बस्तियों में प्रवासनः प्रवासी श्रम बाजार के परिणामों की जांच

Submitted by niuaadmin on 15 अप्रैल 2016 - 5:53pm
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प्रवासन मानव अस्तित्‍व का अभिन्‍न हिस्‍सा है जिसमें लोग राजनैतिक रूप से सुपरिभाषित एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में पलायन करते हैं। इस पलायन में अस्‍थायी/परिसंचरण से सापेक्ष स्‍थायी प्रकृति में अंतर हो सकता है और इसमें दो स्‍थानों के बीच निवासस्‍थल में परिवर्तन शामिल होता है। हालांकि यह स्‍पष्‍ट करने के लिए कई धारणाएं प्रस्‍तुत की गई हैं कि लोग पलायन क्‍यों करते हैं ‘पुश-पुल’ प्रतिमान अभी भी प्रमुख धारणा बनी हुई है। यह प्रवासन कृषक आधारित/आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों से औद्योगिक अंचलों में अथवा उपांतीय से मूल क्षेत्रों में होता है।

कोलकाता की मलिन बस्तियों में प्रमुख सर्वेक्षण के आधार पर, वर्तमान अध्‍ययन से पता चलता है कि गरीब प्रवासी मुख्‍यत: पश्चिम बंगाल और बिहार के आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों से आए हैं। ये प्रवासी मुख्‍यत: समाज के निचले तबके से है और मुख्‍यत: अशिक्षित अथवा अनौपचारिक रूप से शिक्षित हैं। हालांकि, इन लोगों को वर्ष में अधिकांश समयावधि में काम मिल जाता है, इनमें से काफी अधिक लोग स्‍व–नियोजित है। जहां कहीं भी, ये नियमित वेतनभागी नौकरियों में हैं, प्रवासी छोटे मोटे विनिर्माण, कारखानों में श्रमिकों, खुदरा व्‍यापार, होटलों एवं रेस्‍तरां, परिवहन क्षेत्र में एवं घरेलू नौकरानियों में रूप में कार्यरत हैं, जिनमें से सभी में बहुत सीमित ऊर्ध्‍वगामी गति है। इसके अलावा, काम की समयावधि काफी लंबी होती है- यह एक दिन में 8 घंटे से लेकर 16-17 घंटे होती है। ये श्रमिक श्रम बाजार की विभिन्‍न चिंताओं जैसे नौकरी की असुरक्षा, पारिश्रमिक देर से मिलने अथवा न मिलने, काम की नियमित उपलब्‍धता न होने, काम का अनुबंध न किए जाने और सामाजिक सुरक्षा से भी ग्रस्‍त होते हैं। इसके अतिरिक्‍त, टुकडों में भुगतान से नियोक्‍ता को और अधिक लोचशीलता मिल जाती है। इनकी आवास की दशाएं भी इतनी ही दयनीय है जहां ये रहते एवं काम करते हैं।

इस दस्‍तावेज से संकेत मिलता है कि गरीब प्रवासियों को अधिकांश काम शहर की अर्थव्‍यवस्‍था के अनौपचारिक क्षेत्र में रोजगार मिल जाता है। फिर भी, ये सुरक्षा गार्ड, घरेलू नौकरों, वाहन चालकों के संदर्भ में शहर के निवासियों के लिए महत्‍वपूर्ण कार्यों का निर्वहन करते हैं जिनके बिना शहरी जीवन की कल्‍पना करना मुश्किल है।

यह दस्‍तावेज एसएचआरएएमआईसी (स्‍ट्रेंजथेन एण्‍ड हार्मोनाईज रिसर्च एण्‍ड एक्‍शन ऑन माईग्रेशन इन इंडियन कॉन्‍टेक्‍स्‍ट), सर दोराबजी टाटा न्‍यास और सहबद्ध न्‍यासों द्वारा सहायता प्राप्‍त पहल के तहत किए गए अनुसंधान का परिणाम है।

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